भास्कर न्यूज | बारगांव ग्राम बलौदी में आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ सप्ताह के सातवें दिन शनिवार को कथावाचक पंडित जय श्रवण महाराज (सिमगा वाले) ने श्रीकृष्ण विवाह प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा का मुख्य उद्देश्य है, परमपिता परमात्मा की प्राप्ति। यह कथा हमें संसार से भागना नहीं सिखाती, बल्कि संसार में रहते हुए भगवान से जुड़ना सिखाती है। कथा सुनने से मन निर्मल होता है, विवेक जागृत होता है और हृदय में भक्ति का उदय होता है। जब भक्ति दृढ़ होती है, तो जीव धीरे-धीरे परमात्मा की ओर आकर्षित हो जाता है। भागवत कथा सुनने का मौका उसको ही मिलता है, जिस पर भगवान श्री कृष्ण की कृपा होती है। उन्होंने कहा कि विदर्भ के राजा भीष्मक के घर रुिक्मणी का जन्म हुआ। बाल अवस्था से भगवान श्रीकृष्ण को सच्चे हृदय से पति के रूप में चाहती थीं। लेकिन भाई रुिक्मणी का विवाह शिशुपाल के साथ कराना चाहता था। रुिक्मणी ने अपने भाई की इच्छा जानी तो उसे बड़ा दुख हुआ। अत: शुद्धमति के अंतपुर में एक सुदेव नामक ब्राह्मण आता-जाता था। रुिक्मणी ने उस ब्राह्मण से कहा कि वे श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती हैं। सात श्लोकों में लिखा हुआ मेरा पत्र तुम श्रीकृष्ण तक पहुंचा देना। रुिक्मणी साक्षात लक्ष्मी: कथावाचक पंडित जय श्रवण ने बताया कि रुक्मणी स्वयं साक्षात लक्ष्मी हैं और वह नारायण से दूर रह ही नही सकती। श्रीकृष्ण और रुिक्मणि के विवाह की झांकी ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इंद्र लोक से सभी देवताओं द्वारा पुष्पों की वर्षा की तथा खुशियां लुटाई। भागवत कथा सुनने मटिया, कोसपातर, बारगांव, बलौदी व मुड़पार के श्रद्धालु पहुचे। पं. जय श्रवण उन्होंने बताया कि रुिक्मणी ने स्वयं को प्राप्त करने के लिए उपाय भी बताया। पत्र में रुिक्मणी ने बताया कि वह प्रतिदिन पार्वती की पूजा करने के लिए मंदिर जाती हैं, श्रीकृष्ण आकर उन्हें यहां से ले जाओ। पत्र के माध्यम से रुिक्मणी ने कहा कि मुझे विश्वास है कि आप इस दासी को स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं हजारों जन्म लेती रहूंगी। मैं किसी और पुरुष से विवाह नहीं करना चाहती हूं। उन्होंने बताया कि पार्वती के पूजन के लिए जब रुिक्मणी आई, उसी समय प्रभु श्रीकृष्ण रुक्मणी का हरण कर ले गए। अत: रुिक्मणी के पिता ने रीति रिवाज के साथ दोनों का विवाह कर दिया।


