भास्कर न्यूज। लुधियाना आज के दौर में कई टीनएजर्स को पेरेंट्स की बातें कड़वी या दखलअंदाजी जैसी लगने लगी हैं। मोबाइल, सोशल मीडिया और तेजी से बदलती लाइफस्टाइल ने सोच का अंतर बढ़ा दिया है। जहां पेरेंट्स अपने अनुभव के आधार पर समझाते हैं, वहीं किशोर अपने फैसलों को स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं। यही अंतर अक्सर बहस, चिड़चिड़ापन और दूरी का कारण बन जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल जेनरेशन गैप नहीं, बल्कि संवाद की कमी और भावनात्मक जुड़ाव में आई दूरी है। सही तरीके से बातचीत और व्यवहार में बदलाव लाकर इस स्थिति को संभाला जा सकता है। पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि जेनरेशन गैप स्वाभाविक है, लेकिन इसे दीवार नहीं बनने देना चाहिए। पेरेंट्स यदि मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं और टीनएजर्स भी धैर्य के साथ उनकी बात समझने की कोशिश करें, तो रिश्ते मजबूत हो सकते हैं। संवाद, सम्मान और संतुलन ही वह तीन स्तंभ हैं जिन पर परिवार की नींव टिकी रहती है। { पेरेंट्स बिना रोक-टोक के बात करें: माता-पिता रोज कम से कम कुछ मिनट बच्चों से बिना किसी टोका-टाकी के बात करें। केवल पढ़ाई नहीं, उनके दोस्तों, शौक और सपनों के बारे में भी पूछें। जब बच्चा महसूस करेगा कि उसे सुना जा रहा है, तो वह खुलकर अपनी बात कहेगा। { लहजे पर ध्यान दें: सलाह देते समय आदेशात्मक भाषा से बचें। तुम हमेशा गलत करते हो जैसे वाक्य दूरी बढ़ाते हैं। इसके बजाय मुझे तुम्हारी चिंता है कहना अधिक प्रभावी होता है। { तुलना न करें: किसी रिश्तेदार या पड़ोसी के बच्चे से तुलना करने से आत्मसम्मान पर चोट लगती है। हर बच्चा अलग है, उसकी क्षमता और रुचि भी अलग होती है। { सीमाएं स्पष्ट लेकिन लचीली हों: घर के नियम तय हों, लेकिन उनमें संवाद की गुंजाइश भी रहे। यदि बच्चा किसी बात पर असहमति जताता है, तो उसकी बात भी सुनी जाए। { टेक्नोलॉजी को दुश्मन न बनाएं: मोबाइल या सोशल मीडिया को पूरी तरह बंद करने की बजाय संतुलन सिखाएं। साथ बैठकर ऑनलाइन सुरक्षा और समय प्रबंधन पर बात करें। { प्रशंसा का महत्व: केवल गलतियों पर ध्यान देने से बच्चा दूर हो सकता है। उसकी छोटी उपलब्धियों की भी सराहना करें। इससे विश्वास और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते हैं। टीनएज वह समय होता है जब बच्चा अपनी पहचान बनाने की कोशिश करता है। उसे लगता है कि वह अब बड़ा हो गया है और अपने फैसले खुद ले सकता है। ऐसे में जब माता-पिता पढ़ाई, दोस्तों, कपड़ों या समय को लेकर सलाह देते हैं, तो वह उसे रोक-टोक समझ सकता है। सोशल मीडिया ने भी तुलना की प्रवृत्ति बढ़ा दी है। टीनएजर्स अपने दोस्तों या इन्फ्लुएंसर्स की लाइफ देखकर प्रभावित होते हैं और घर की पाबंदियां उन्हें पिछड़ा हुआ महसूस करा सकती हैं। दूसरी ओर, माता-पिता सुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। वे अपने अनुभव से सीख लेकर बच्चों को गलतियों से बचाना चाहते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इस उम्र में भावनाएं तीव्र होती हैं और दिमाग का निर्णय लेने वाला हिस्सा पूरी तरह परिपक्व नहीं होता, इसलिए छोटी-छोटी बातें भी बड़ी लग सकती हैं। यदि पेरेंट्स का लहजा कठोर हो या तुलना की जाए, तो बच्चे रक्षात्मक हो जाते हैं और बात ‘कड़वी’ महसूस होती है।


