लुधियाना में खनन के खिलाफ ग्रामीणों का प्रदर्शन:बोले-जिस मिट्टी में हमने बचपन बिताया, उस जमीन को रेत माफिया का नहीं होने देंगे

लुधियाना जिले के जगराओं के खैहरा बेट गांव में बीते शनिवार को सतलुज दरिया किनारे रेत खनन के खिलाफ ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया है। इस दौरान ‘गांव बचाओ-जान बचाओ’ मुहिम का आगाज करते हुए ग्रामीणों ने सरकार को आर-पार की लड़ाई की चेतावनी दी। यह संघर्ष अब जन आंदोलन का रूप ले चुका है। प्रदर्शन स्थल पर आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। इनमें महिलाएं, बुजुर्ग और युवा शामिल थे, जिन्होंने सरकार के खिलाफ नारे लगाए। गांव की चौपाल से शुरू हुई यह आवाज अब पूरे इलाके में फैल रही है। पूर्व सरपंच हरदीप सिंह लक्की ने मंच से कहा कि यह किसी पार्टी की नहीं, बल्कि ग्रामीणों के अस्तित्व की लड़ाई है। हरदीप सिंह ने जोर देकर कहा कि गांव में विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग हो सकते हैं, लेकिन गांव के डूबने पर कोई पार्टी नहीं बचेगी। यह उनके बच्चों के भविष्य का सवाल है। सत्ता पक्ष पर आंदोलन को कमजोर करना का आरोप लक्की ने सरकार पर आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष आंदोलन को पार्टीबाजी में बांटकर कमजोर करना चाहता है। उन्होंने कहा, “जिस मिट्टी में हमने बचपन बिताया और जहां हमारे बुजुर्गों की यादें बसी हैं, उस जमीन को हम रेत माफिया के हवाले नहीं होने देंगे।” एडवोकेट एवं पार्षद रविंदरपाल राजू कामरेड ने भी सरकार और प्रशासन की आलोचना की। कामरेड ने बताया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने 14 मई तक खनन पर रोक लगाई है, इसके बावजूद कुछ स्थानों पर सत्ता के संरक्षण में करोड़ों रुपये की रेत निकाली जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि खैहरा बेट में प्रदर्शन के कारण पोकलेन मशीनें दरिया में खड़ी हैं, लेकिन प्रशासन की मिलीभगत से आदेशों का उल्लंघन किया जा रहा है। प्रशासन को दी चेतावनी कामरेड ने चेतावनी दी, “अगर यहां से एक भी पीपा रेत उठाया गया, तो उसका जिम्मेदार प्रशासन होगा। खैहरा बेट की सीमा से सरकार को एक कण रेत भी नहीं ले जाने दिया जाएगा।”धरने में ट्रांसपोर्ट यूनियन, किसान संगठनों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने पहुंचकर आंदोलन को समर्थन दिया। वक्ताओं ने दो टूक कहा कि यह सिर्फ रेत की लड़ाई नहीं, बल्कि गांव की अस्मिता, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व की लड़ाई है। खैहरा बेट के लोगों ने साफ कर दिया है कि अब वे डरने वाले नहीं हैं। पार्टी राजनीति से ऊपर उठकर गांव की रक्षा के लिए यह आंदोलन जारी रहेगा, चाहे इसके लिए कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।

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