उदयपुर के कमोल गांव में जैन दीक्षा ग्रहण कर मुमुक्षु शीतल चंदन सोलंकी साध्वी बन गईं। अब उन्हें नया नाम साध्वी आगम प्रभा दिया गया है। वे पिछले 11 वर्षों से धर्म के बारे में समझते हुए साध्वीवृंद के सान्निध्य में वैराग्य काल में बहुत कुछ सीख रही थी। उदयपुर के सायरा स्थित कमोल गांव में आयोजित पांच दिवसीय जैन भगवती दीक्षा महोत्सव का रविवार को समापन हुआ। इस मौके पर कमोल गांव में रविवार को विशाल वरघोड़ा निकाला गया। 17 फरवरी से शुरू हुए इस धार्मिक आयोजन में मुमुक्षु शीतल चंदन सोलंकी के दीक्षा संस्कार को लेकर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इससे पहले सुबह मुमुक्षु शीतल की घर से विदाई हुई। इस दौरान जैन संतों द्वारा मंगल पाठ किया गया। मुमुक्षु शीतल ने दीक्षा से पहले संसार में रहते हुए अंतिम बार संतों को गोचरी पातरे में देकर लाभ लिया। वहीं जैन दर्शन में MA पास मुमुक्षु शीतल ने अपने वैराग्य काल के दौरान उन्होंने लगभग 7000 किलोमीटर की पदयात्रा की हैं। पहले देखें PHOTOS गांव से दीक्षा स्थली तक निकला वरघोड़ा
वरघोड़ा गांव के विभिन्न मार्गों से होते हुए दीक्षा स्थली पहुंचा। जहां रास्ते में श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर विदाई दी। इस दौरान परिजनों और ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं। दीक्षा स्थल पर विराजित जैन संतों एवं साध्वियों ने दीक्षा के महत्व, सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। प्रवचनों के बाद मुमुक्षु शीतल ने अपने परिजनों व समाजजनों को भावुक विदाई देते हुए सांसारिक मोह-माया का त्याग कर श्वेत वस्त्र धारण किए। रजोहरण संस्कार संपन्न कराया
कार्यक्रम में उपाध्याय डॉ. गौतम मुनि ने रजोहरण संस्कार संपन्न कराया गया। साथ ही वे दक्षिण चंद्रिका महासाध्वी डॉ. संयमलता म.सा. की शिष्या बनीं। शीतल को आगम प्रभा साध्वी नाम दिया गया। कार्यक्रम में जिनेंद्र मुनि, रमेश मुनि, विजय मुनि, शांता कंवर, कंचन कंवर, सुप्रभा, मणिप्रभा आदि ने धर्म सभा को संबोधित किया। इस दौरान मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, पाली सहित आसपास क्षेत्रों से हजारों श्रावक-श्राविकाएं एवं ग्रामीण उपस्थित रहे। संचालन श्रावक घनश्याम सोलंकी द्वारा किया गया। जानिए मुमुक्षु शीतल के बारे में
मुमुक्षु शीतल का जन्म 30 अक्टूबर 1990 को बोइसर (मुंबई) में हुआ था। मूल रूप से कमोल गांव की शीतल ने जैनोलॉजी (जैन दर्शन) में एम.ए. (M.A.) की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने 3 वर्षी तप (एकासन के), अठाई तप और तेले तप सहित कई अन्य तप भी किए हैं। अपने वैराग्य काल के दौरान उन्होंने लगभग 7000 किलोमीटर की पदयात्रा की है। वीडियो : गोपाल लोढ़ा, गोगुंदा


