राजस्थान के राजकीय पक्षी गोडावण की साल 2025 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा की गई राष्ट्रीय वैज्ञानिक गणना में जैसलमेर और आसपास के 22 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कुल 198 गोडावण दर्ज किए गए हैं। 7 से 17 अप्रैल 2025 तक 50 से अधिक टीमों और 200 से ज्यादा वैज्ञानिकों, स्वयंसेवकों और वनकर्मियों ने फील्ड में डेटा जुटाया। सर्वे में सामने आया कि खुले जंगल और डेजर्ट नेशनल पार्क क्षेत्र में 130 गोडावण हैं, जबकि रामदेवरा और सम स्थित ब्रीडिंग सेंटर्स में 68 पक्षी मौजूद हैं। कुछ साल पहले तक विशेषज्ञ मान रहे थे कि गोडावण आने वाले समय में पूरी तरह खत्म हो सकता है। 2017 की गणना में कुल संख्या 128 थी। अब 2025 में यह बढ़कर 198 हो गई है। यह बदलाव संरक्षण प्रयासों के असर को दिखाता है। शून्य से 68 तक का सफर: ब्रीडिंग सेंटर्स ने किया कमाल इस पूरी गणना का सबसे चौंकाने वाला और सुखद पहलू ब्रीडिंग सेंटर्स का प्रदर्शन रहा है। साल 2017 में जब पिछली बड़ी गणना हुई थी, तब जैसलमेर के ब्रीडिंग सेंटर्स में गोडावणों की संख्या शून्य थी। लेकिन 2025 की गणना में रामदेवरा और सम स्थित ब्रीडिंग सेंटर्स में कुल 68 गोडावण दर्ज किए गए हैं। यह सफलता ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ (कृत्रिम प्रजनन) कार्यक्रम की है, जिसे भारतीय वन्यजीव संस्थान और राजस्थान वन विभाग ने मिलकर चलाया। जंगलों से गोडावण के अंडों को सुरक्षित उठाकर उन्हें इन केंद्रों में हैच किया गया और चूजों की विशेष निगरानी में परवरिश की गई। आज ये 68 पक्षी इस प्रजाति के लिए ‘इंश्योरेंस पॉपुलेशन’ का काम कर रहे हैं। खुले आसमान के नीचे 130 ‘आजाद’ गोडावण गणना के आंकड़ों के अनुसार, जैसलमेर के खुले जंगलों, डेजर्ट नेशनल पार्क और सेना के पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में कुल 130 गोडावण विचरण कर रहे हैं। 2017 में यह संख्या 128 थी। भले ही खुले जंगल में संख्या में बहुत बड़ी बढ़ोतरी न दिख रही हो, लेकिन बिजली की लाइनों और शिकार जैसे खतरों के बावजूद संख्या का स्थिर रहना और मामूली बढ़ना भी विशेषज्ञों द्वारा एक बड़ी जीत माना जा रहा है। वैज्ञानिक पद्धति: वॉटर होल को छोड़ ‘ब्लॉक सैंपलिंग’ अपनाई इस बार वन विभाग ने गणना के पुराने और पारंपरिक ‘वॉटर होल’ (पानी के गड्ढों पर बैठकर गिनती) तरीके को दरकिनार कर दिया। WII का मानना है कि वॉटर होल पद्धति वैज्ञानिक रूप से सटीक नहीं होती क्योंकि कई बार एक ही पक्षी अलग-अलग जलस्रोतों पर गिना जा सकता है या कई पक्षी पानी पीने ही नहीं आते। इस बार ‘ऑक्यूपेंसी एंड डिस्टेंस सैंपलिंग’ पद्धति का उपयोग किया गया। इसके तहत: तुलनात्मक अध्ययन टीम वर्क और तकनीक की जीत डेजर्ट नेशनल पार्क के उप वन संरक्षक बी.एम. गुप्ता ने कहा, “8 साल बाद हुई इस विस्तृत गणना ने दिखाया है कि जैसलमेर का ईकोसिस्टम गोडावण के लिए सुरक्षित बना हुआ है।” GIB ब्रीडिंग सेंटर के कोऑर्डिनेटर डॉ. सुतीर्थो दत्ता ने बताया कि दुनिया के करीब 70 प्रतिशत गोडावण जैसलमेर में हैं। प्राथमिकता इन्हें बिजली के तारों से बचाने और प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की है। 198 का आंकड़ा आगे के संरक्षण प्रयासों के लिए सकारात्मक संकेत है। ‘सॉफ्ट रिलीज’ की तैयारी अब वन विभाग का अगला लक्ष्य ब्रीडिंग सेंटर्स में पैदा हुए गोडावणों को धीरे-धीरे खुले जंगल में छोड़ने का है। इसे ‘सॉफ्ट रिलीज’ कहा जाता है। इसके लिए विशेष बाड़े बनाए जा रहे हैं जहाँ इन पक्षियों को जंगली वातावरण के अनुकूल ढाला जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो अगले 5 वर्षों में खुले जंगल में गोडावणों की संख्या 250 के पार पहुँच सकती है।


