शहर की सरकार के चुनाव में 59.79 मतदाताओं ने डाले वोट

भास्कर न्यूज|गुमला गुमला नगर परिषद की नई सरकार चुनने के लिए सोमवार को मतदान की प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गई। हालांकि इस बार लोकतंत्र के इस उत्सव में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। पूरे 18 साल बाद ईवीएम की जगह बैलेट पेपर के जरिए मतदान कराया गया। तकनीक से दोबारा पारंपरिक कागजी प्रक्रिया पर लौटने का असर सीधा मतदान प्रतिशत पर पड़ा। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार मतदाताओं के उत्साह में कमी दर्ज की गई और वोटिंग ग्राफ नीचे गिर गया। आंकड़ों की बात करें तो पिछले नगर निकाय चुनाव में गुमला ने 62.17 प्रतिशत के करीब रिकॉर्ड मतदान कर एक मिसाल पेश की थी। लेकिन इस बार यह आंकड़ा 2.38% की गिरावट के साथ 59.79 प्रतिशत पर सिमट गया। जानकारों का मानना है कि बैलेट पेपर से वोट डालने की लंबी प्रक्रिया और मुहर लगाने की तकनीकी समझ न होने के कारण मतदान की गति धीमी रही। एक वोट डालने में लगने वाले अतिरिक्त समय की वजह से कई केंद्रों पर मतदाताओं को लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी। जिससे औसत प्रतिशत प्रभावित हुआ। चुनाव के दौरान प्रशासनिक दावों के बीच कुछ खामियां भी नजर आईं। शहर के कई मतदान केंद्रों पर निर्धारित समय से देरी से वोटिंग शुरू हुई। कई बूथों पर मतदान की गति इतनी धीमी थी कि भीषण धूप में खड़े मतदाताओं का धैर्य जवाब दे गया। कई केंद्रों पर लोगों ने धीमी प्रक्रिया को लेकर नाराजगी जताई और पीठासीन अधिकारियों से बहस भी की। मतदाताओं का कहना था कि बैलेट पेपर पर मुहर लगाने और उसे मोड़कर पेटी में डालने की प्रक्रिया में समय अधिक लग रहा है। जिससे कतारें छोटी नहीं हो रही थीं। प्रशासन ने मतदाताओं की सहूलियत के लिए ठोस कदम भी उठाए थे। बुजुर्गों और दिव्यांगों को घर से बूथ तक लाने के लिए विशेष ई-रिक्शा की व्यवस्था की गई थी। जिसने मतदान प्रतिशत को एक स्तर तक बनाए रखने में मदद की। सुरक्षा के दृष्टिकोण से पूरा शहर पुलिस छावनी में तब्दील रहा। चुनाव पर्यवेक्षक और जिला प्रशासन के वरीय अधिकारी लगातार विभिन्न वार्डों का दौरा करते रहे ताकि कहीं भी फर्जी मतदान या व्यवधान की स्थिति पैदा न हो। जबकि प्रत्याशियों ने भी वोटर को बूथ तक लाने व ले जाने के लिए गाड़ियों की सुविधा बहाल की थी। इस चुनावी समर में दिव्यांग मतदाताओं ने भी अपनी शारीरिक सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए मतदान किया। कोई अपनों के कंधे का सहारा लेकर पहुंचा तो कोई बैसाखी-छड़ी के सहारे लोकतंत्र को मजबूती देने आया। जिला प्रशासन द्वारा मुहैया कराई गई व्हीलचेयर और सहयोगियों की मदद से दिव्यांगों ने बिना किसी बाधा के अपने मताधिकार का प्रयोग किया। दिव्यांग मतदाताओं का कहना था कि शहर की सरकार चुनने में उनकी भी उतनी ही भूमिका है। जितनी किसी और की। वोट देकर निकलती बुजुर्ग महिला।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *