गरमा मूंग ग्रीष्मकालीन मौसम की एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल

गुमला|गरमा मूंग ग्रीष्मकालीन मौसम की एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है, जो कम अवधि में पककर किसानों को अच्छा लाभ देती है। झारखंड की जलवायु इसके लिए अनुकूल है। जिला कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक अटल तिवारी ने कहा कि यह फसल लगभग 60-70 दिनों में तैयार हो जाती है। इसलिए रबी फसल कटने के बाद खाली खेतों में इसे आसानी से लगाया जा सकता है। मूंग की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु पाए जाते हैं, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर कर भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि गरमा मूंग के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। एक गहरी जुताई के बाद 2-3 जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लें और 5-7 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद मिला दें। उन्होंने कहा कि जिले के लिए सम्राट, आइपीएम 02-3, एसभीएम-55, शिखा व विराट जैसी उन्नत किस्में उपयुक्त हैं। बुआई का समय 10 मार्च से 10 अप्रैल तक है। प्रति हेक्टेयर 20-25 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। कतार दूरी 30 सेंटीमीटर तथा पौधों की दूरी 10 सेंटीमीटर रखें। बीज उपचार के लिए 2-3 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करें, उसके बाद राइजोबियम कल्चर लगाएं। उर्वरक प्रबंधन में 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-50 किलोग्राम फॉस्फोरस तथा 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर दें। ​अटल तिवारी । कृ​िष वैज्ञानिक गुमला । आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 7482098079 पर सिर्फ मैसेज करें।

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