आम की फसल में आईपीएम पद्धति को बढ़ावा, कीट नियंत्रण में मिलेगी राहत

भास्कर न्यूज | जामताड़ा आम की फसल में कीटों से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए आईपीएम (एकीकृत कीट प्रबंधन) पद्धति को एक प्रभावी और टिकाऊ समाधान के रूप में अपनाया जा रहा है। यह पद्धति केवल रासायनिक दवाओं पर निर्भर न रहकर विभिन्न वैज्ञानिक तरीकों के समन्वय से कीटों को नियंत्रित करने पर आधारित है, जिससे फसल की सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन भी बना रहता है।‌जिला कृषि पदाधिकारी लव कुमार ने बताया कि आईपीएम पद्धति के तहत सबसे पहले कीट निगरानी और मूल्यांकन पर जोर दिया जाता है। इसमें आम के बागानों में कीटों की उपस्थिति, उनकी संख्या और क्षति के स्तर की नियमित जांच की जाती है, ताकि समय रहते सही निर्णय लिया जा सके। इसके बाद सांस्कृतिक नियंत्रण विधियां अपनाई जाती हैं, जैसे बाग की सफाई, रोगग्रस्त टहनियों की छंटाई, उचित दूरी पर पौधारोपण और फसल चक्र का पालन। इस पद्धति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जैविक नियंत्रण है, जिसमें मित्र कीटों, परजीवियों और अन्य प्राकृतिक शत्रुओं की मदद से हानिकारक कीटों की संख्या को नियंत्रित किया जाता है। केवल अंतिम विकल्प के रूप में और आवश्यकता पड़ने पर ही रासायनिक कीटनाशकों का सीमित एवं लक्षित उपयोग किया जाता है, जिससे लागत कम होती है और फल सुरक्षित रहते हैं। आईपीएम पद्धति के कई लाभ सामने आ रहे हैं। इससे किसानों की इनपुट लागत घटती है, पर्यावरण और मिट्टी की सेहत बनी रहती है तथा आम की पैदावार और गुणवत्ता में सुधार होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और अन्य सरकारी एजेंसियां इस पद्धति को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चला रही हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आम की खेती में आईपीएम पद्धति को व्यापक रूप से अपनाया जाए, तो किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ टिकाऊ कृषि को भी मजबूती मिलेगी। आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 7 9 9233 7144 पर सिर्फ मैसेज करें। लव कुमार कृषि पदाधिकारी

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