‘रात में बस चलती नहीं। ऑटो वाले 100 रुपए मांगते हैं। रोज इतना पैसा देने लगूं तो काम करने का मतलब क्या रह जाएगा। रात में लोग डरते हैं। लिफ्ट भी नहीं देते।’ मालती ने सोमवार को जब अपना यह दर्द बताया तो उसकी आवाज में मजबूरी और परेशानी दोनों झलक रही थीं। रात के 8 बजे वह एम्स के गेट नंबर एक की तरफ से जल्दी-जल्दी चलते हुए टाटीबंध चौक की ओर जा रही थीं। बार-बार पलटकर पीछे भी देखा। शायद इस उम्मीद में कि कोई लिफ्ट दे देगा। चंदनीडीह जाएगी। यह नेशनल हाइवे पर स्थित रायपुर के आउटर का गांव है। पूछने पर बताने लगीं, ‘एम्स के पीछे एक घर में दिन में बच्चे की देखरेख करती हैं। रात 8 बजे छुट्टी मिलती है। कोई लिफ्ट देता नहीं। इसलिए पैदल ही जा रही है।’ टाटीबंध चौक पर एक और युवती परेशान दिख रही है। उसके पास एक ट्रॉली बैग है। वह बार-बार ऑटो चालकों से बात कर रही है और फिर खड़ी हो जा रही है। पूछने पर बताने लगी, ‘कचना कालोनी जाना है। शहडोल से आ रही हूं। आधे घंटे से ज्यादा हो गया इंतजार करते। एक भी बस नहीं आ रही। ऑटो के लिए कोई 1000 तो कोई 900 रुपए मांग रहा है। रायपुर बड़ा शहर है। राजधानी है। एक भी सिटी बस नहीं चलती तो किस बात की राजधानी? हर दस मिनट में बस नहीं चला सकते तो एक-एक घंटे में ही चला दो। साढ़े आठ बजे कौन सी रात हो गई है कि ऑटो वाले इतना पैसा मांग रहे हैं।’ रात 10 बजे, भनपुरी चौक : स्टेशन के लिए सिर्फ रिजर्व ऑटो… रात में भनपुरी चौक पर भी परेशानी कम नहीं है। रायपुर का संभवत: सबसे बड़ा चौक है। अंधेरे में स्टैंड में तीन लोग खड़े हैं। कितनी देर से खड़े हैं, पूछने पर सुनील साहू बताने लगे, ‘टाटीबंध गया था मिक्सर मशीन लोड करवाने। लेट हो गया। रात में उधर से आने का कोई साधन नहीं है। एक ऑटो में सौ रुपए देकर भनपुरी चौक आया हूं। अब यहां से भी स्टेशन चौक जाने के लिए 100 रुपए मांग रहे हैं। मालिक से सौ रुपए मिला था। इससे ज्यादा तो खर्च हो चुका है। मालिक को बताऊंगा तो मानेंगे नहीं। क्या करें? सिटी बस चलती थी तो अच्छा था। कम भाड़ा लगता था। कुछ दूर छोड़ दीजिए, चला जाऊंगा। साइकिल फाफाडीह में खड़ी है। घर प्रोफेसर कालोनी में है।’ भनपुरी चौक पर ही पिता-पुत्र भी परेशान हैं। उनको स्टेशन जाना है। ऑटोहै। इसलिए रात में जरूरी है पब्लिक ट्रांसपोर्ट :
रायपुर का तेजी से विस्तार हो रहा है। होटल, अस्पताल, रेस्टोरेंट, दुकानें, सिक्योरिटी और मॉल आदि में काम रात तक होता है। यहां काम करने वाले अधिकांश कर्मचारी गरीब और मध्यम आय वर्ग से आते हैं। इनकी आमदनी इतनी नहीं होती कि वे रात में कार, कैब या ऑटो का किराया वहन कर सकें। ऐसे में राजधानी रायपुर में रात 11 बजे तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा जरूरी है। रात 9:00 बजे, कालीबाड़ी चौक| जानबूझकर शरीर से सटते हैं
आरती कालीबाड़ी चौक पर ऑटो का इंतजार कर रही है। घड़ी चौक के पास कंप्यूटर ऑपरेटर का काम करती है। सेजबहार कालोनी जाना है। पूछने पर बताने लगी, ‘ रात में परेशानी तो होती है लेकिन क्या करें। ऑटो में लोग जानबूझकर शरीर से सटते रहते हैं। उतरने-चढ़ने में भी दिक्कत करते हैं। बस ठीक है। अलग-अलग सीट रहती है। लेकिन बस चलती ही कहां है? पहले चलती थी। कोरोना के बाद बंद हो गई।’ रात 9:30 बजे, कपड़ा मार्केट पंडरी| लाइव लोकेशन ऑन रखती हूं…
सड्डू की मोनिका पंडरी के एक शो-रूम में काम करती है। कहती है, ‘दुकान बंद होते-होते साढ़े दस बज जाते हैं। रात में ऑटो नहीं मिलता। साइकिल से आती-जाती है।’ पूछने पर बताने लगी, ‘ रास्ते में कई जगह सुनसान है। स्ट्रीट लाइट नहीं है। अंधेरा रहता है। डर कम करने के लिए मोबाइल पर बात करते हुए जाती हूं। रास्ते में लाइव लोकेशन शेयरिंग एप ऑन रखती हूं। इधर पुलिस पेट्रोलिंग कम है।’ रात10:20 बजे: रेलवे स्टेशन | सत्यसांई अस्पताल के लिए इंतजार प्लेटफॉर्म नंबर एक पर ट्रेन आई है। मुख्य द्वार से लोग बाहर निकल रहे हैं। 25-30 ऑटोवाले दीवार बनकर सामने खड़े हैं। इसी भीड़ में एक व्यक्ति ज्यादा परेशान लग रहा है। दो-तीन ऑटोवालों से बात करने के बाद उदास है। दो बैग, दो झोले, पत्नी और बच्चे के साथ किनारे खड़ा है। पूछने पर बताया, ‘राजस्थान से आ रहा हूं। बच्चे को दिल की बीमारी है। सत्यसांई अस्पताल जाना है। ऑटोवाले 1200 रुपए मांग रहे हैं।’ पास खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि सामने बस स्टैंड है। जाकर पूछ लो। वहां सेक्युरिटी गार्ड से पता चला कि आखिरी बस साढ़े नौ बजे जाती है। रोज कोई न कोई रात में आता है जिसको सत्यसांई अस्पताल जाना होता है। शहर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहतर करने के लिए 100 ई-बसें खरीदी जा रही हैं। शहर में जहां-जिस समय जरूरत होगी, नई ई-बसें चलाई जाएंगी। यात्रियों की सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।
-विश्वदीप, आयुक्त, नगर निगम, रायपुर


