सुकमा की ऊंची पहाड़ियों पर बसे गोगुंडा में सात दशक बाद उजियारा

भास्कर न्यूज | सुकमा दक्षिण बस्तर के घने जंगलों और लगभग 650 मीटर ऊंची खड़ी पहाड़ी पर बसा गोगुंडा गांव आज एक नई इबारत लिख रहा है। कभी नक्सली गतिविधियों के साये में सन्नाटे और डर की पहचान बना यह गांव अब रोशनी से सराबोर है। आजादी के सात दशकों और अपने अस्तित्व के लगभग 40 साल बाद पहली बार यहां बिजली पहुंची है, जिसने न केवल घरों के अंधेरे को दूर किया है, बल्कि ग्रामीणों के मन में विकास और सुरक्षा के प्रति एक नया विश्वास भी जगाया है। ​वर्षों तक दुर्गमता और असुरक्षा इस गांव की सबसे बड़ी बाधा बनी रही। ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों और गहरी घाटियों के बीच बसे इस इलाके में सूरज ढलते ही जिंदगी थम जाती थी। ग्रामीण मिट्टी के तेल की ढिबरी और लालटेन की धुंधली रोशनी में जीने को मजबूर थे, जहां जहरीले जीव-जंतुओं का डर और नक्सलियों की आहट उनकी दिनचर्या का हिस्सा थी। बच्चे उसी मद्धम रोशनी में भविष्य गढ़ने की कोशिश करते और महिलाएं धुएं के बीच चूल्हा फूंकती थीं। लेकिन वक्त बदला और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने यहां विकास का रास्ता साफ किया।

​वह पल पूरे गांव के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था जब ट्रांसफार्मर चालू हुआ और पहली बार गांव की गलियां दूधिया रोशनी में नहा उठीं। बुजुर्ग ग्रामीण माड़वी सुक्का की आंखों में आए आंसू उस चार दशक लंबे इंतजार की गवाही दे रहे थे, जो उन्होंने अंधेरे में काटा था। आज गोगुंडा की शाम पहले जैसी डरावनी नहीं रही। अब यहां रात में भी सिलाई-बुनाई का काम होता है, युवा मोबाइल के जरिए बाहरी दुनिया से जुड़ रहे हैं और बच्चे बिना किसी बाधा के अपनी पढ़ाई पूरी कर पा रहे हैं। कलेक्टर अमित कुमार और एएसपी रोहित शाह इस बदलाव को केवल एक सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं। बिजली आने से अब गांव के स्कूल डिजिटल होंगे और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में रात के समय भी इलाज मिल सकेगा। सीआरपीएफ के तालमेल से दुर्गम रास्तों पर सड़क निर्माण ​ कमांडेंट हिमांशु पांडे और असिस्टेंट कमांडेंट अंकित सिंह के नेतृत्व में सीआरपीएफ की 74वीं वाहिनी ने जब यहां मोर्चा संभाला, तो ग्रामीणों के मन से भय कम हुआ और प्रशासन के प्रति भरोसा बढ़ा। जिला पुलिस और सीआरपीएफ के आपसी तालमेल से दुर्गम रास्तों पर सड़क का निर्माण हुआ, जिसने गोगुंडा को मुख्यधारा से जोड़ दिया। इस सड़क के पहुंचते ही प्रशासन ने बुनियादी सुविधाओं का जाल बिछाना शुरू किया, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती थी पहाड़ी के ऊपर बिजली की लाइन पहुंचाना। वन विभाग और बिजली विभाग के प्रयासों ने इस कठिन लक्ष्य को हासिल कर दिखाया।

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