हेतराम बेनीवाल राजनेता ही नहीं किसान और मजदूरों के मसीहा थे। अपनी ठोस और बेबाक बात रखने की शैली के कारण उनमें लोगों को बांधकर रखने की मजबूत कला थी। भले ही आज मैं भाजपा में हूं लेकिन राजनीति में जमीनी संघर्ष मैंने उनसे ही सीखा। मुझे आज भी याद है 27 सितंबर 2004 से घड़साना-रावला किसान आंदोलन चल रहा था। उस जमाने में जनता के तन-मन में सिर्फ एक ही नाम होता था, हेतराम बेनीवाल। जनता इनके इशारे पर कुछ भी करने को आमादा रहती थी। कांग्रेस के राज में इमरजेंसी के अंदर भी पूरे देश की विपक्ष को जब जेल के अंदर रखा गया तो संघ के साथ-साथ बेनीवाल और उनके साथियों को भी जेल में यातनाएं दी गईं। 1971-72 के दौरान आईजीएनपी के प्रथम चरण के जमीन आवंटन को लेकर चले आंदोलन में भी उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। इनकी वजह से तत्कालीन सीएम मोहनलाल सुखाड़िया की सरकार को झुकना पड़ा था। 2003 में वसुंधरा सरकार को झुकाया था। श्रीगंगानगर| माकपा के कद्दावर नेता पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल का 94 वर्ष की उम्र में 23 फरवरी की रात को निधन हो गया। उन्होंने टांटिया अस्पताल में रात 10:58 बजे आखिरी सांस ली। उनका जन्म 16 अक्टूबर 1932 को हुआ था। उनको तीन दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के कारण भर्ती करवाया गया था। ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद उनको हैवी निमोनिया हो गया था। उनके शव को रात 12:30 बजे घर 8 एलएनपी ले जाया गया। उनके निकटतम मित्र एडवोकेट चरणदास कंबोज ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को पैतृक गांव 8 एलएनपी में शाम को 4 बजे किया जाएगा। किसान व मजदूर नेता बेनीवाल ने संगरिया विधानसभा क्षेत्र से माकपा की टिकट पर पहली बार 1967 में चुनाव लड़ा था। 1977 का चुनाव टिकट नहीं मिलने के कारण नहीं लड़ा। वर्ष 1990-91 के चुनाव में संगरिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए लेकिन उनका कार्यकाल ढाई वर्ष ही रहा। विधानसभा भंग कर दी गई थी। पूर्व विधायक बेनीवाल ने संगरिया विधानसभा क्षेत्र के टूटकर सादुलशहर विधानसभा क्षेत्र बनने के बाद 2004 में आखिरी चुनाव लड़ा। उनके दो बेटे और एक बेटी है। उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का पिछले साल ही निधन हुआ था। बेनीवाल मजदूर और किसान नेता के रूप में जननायक के तौर पर पहचान रखते थे। उन्होंने राजस्थान कैनाल जमीन आवंटन आंदोलन, घड़साना का किसान आंदोलन, जेसीटी मिल का मजदूर आंदोलन तथा भाखड़ा और गंगनहर के अनेक किसान आंदोलनों का सफलता पूर्वक नेतृत्व किया। उन्हें गरीबों का मसीहा भी कहते थे क्योंकि हर आंदोलन मजबूर, मजदूर और किसानों के लिए ही किया था। उनके आंदोलनों की रणनीति को कोई भी अधिकारी समझ नहीं पाता था।


