भास्कर संवाददाता | भीलवाड़ा बिहार की 8 वर्षीय खुशबू मांझी, छत्तीसगढ़ का 7 साल का विकास और कुलमणि, उत्तरप्रदेश का 10 वर्षीय साहिल अलि, लता और सुजाता ये सभी ईंट भट्टों पर काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों के बच्चे हैं जो आज भी शिक्षा से वंचित हैं। ये बच्चे स्कूल नहीं जाते और न इन तक स्कूल पहुंच पा रहा है। ये बच्चे किताबों और खिलौनों की जगह भट्टों की ईंटों से ही खेलते हैं। जिले में शिक्षा का दावा मजबूत से पेश किया जाता है, लेकिन हकीकत कुछ और भी है। मांडल, आसींद और करेड़ा क्षेत्रों के ईंट भट्टों पर रहने वाले हजारों प्रवासी मजदूरों के बच्चे आज भी स्कूल की चौखट से दूर हैं। ये बच्चे उत्तर प्रदेश और बिहार से आए मजदूर परिवारों के हैं, जो साल के 9-10 महीने जिले में रहते हैं, लेकिन न यहां पढ़ पाते हैं और न अपने राज्य में। प्रवेश सत्र के समय ये यहां नहीं होते और लौटने पर भी उनके लिए स्कूल का रास्ता नहीं खुलता। नतीजा यह कि हजारों बच्चे शिक्षा से पूरी तरह वंचित रह जा रहे हैं। ईंट भट्टों पर काम करने वाले मजदूर परिवार जुलाई से सितंबर के बीच अपने राज्यों में लौट जाते हैं। इसी दौरान सरकारी स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो जाती है। जब ये परिवार अक्टूबर-नवंबर में वापस आते हैं, तब इन बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए सरकारी शिक्षक भी कोशिश नहीं करते। ऐसे में बच्चे न यहां स्कूल जा पाते हैं और न बीच के महीनों में अपने राज्य में पढ़ पाते हैं। विभाग ने बजट नहीं होना बताकर इन बच्चों के लिए किसी प्रकार के ब्रिज कोर्स का संचालन नहीं किया और न ही इन बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाया। फैक्ट फाइल जिले में ईंट भट्टे : 170 से ज्यादा मांडल, आसींद और करेड़ा में : 100 से ज्यादा भट्टे प्रवासी श्रमिकों की संख्या : 5 हजार प्रवासी श्रमिकों के बच्चों की संख्या : एक हजार से अधिक प्रवासी श्रमिकों के बच्चे दो साल से प्रवासी श्रमिकों के बच्चों के लिए चलाया ब्रिज कोर्स भी बंद पहले शिक्षा विभाग प्रवासी बच्चों के लिए ब्रिज कोर्स चलाता था। 15 से कम बच्चों वाले परिवारों के बच्चों का स्कूलों में नामांकन कराया जाता था और ज्यादा संख्या होने पर ईंट भट्टों पर ही अस्थाई स्कूल खोले जाते थे। वहां शिक्षक और दोपहर का भोजन भी मिलता था। लेकिन यह पूरी व्यवस्था पिछले दो साल से बंद है। अब इन बच्चों को न शिक्षा मिल रही है और न मिड डे मील। इन क्षेत्रों में काम करने वाले सामाजिक संगठनों ने कई बार शिक्षा विभाग को स्थिति से अवगत कराया, लेकिन बजट की कमी का हवाला देकर मामले को टाल दिया गया। जबकि समग्र शिक्षा अभियान के तहत हर बच्चे को शिक्षा से जोड़ना विभाग की जिम्मेदारी है। एडीपीसी कल्पना शर्मा ने सामाजिक संगठनों को इन बच्चों के संबंध में लिखित में कहा है कि विभागीय स्तर पर वर्तमान में गैर आवासीय या आवासीय ब्रिज कोर्स संचालन करने के लिए सत्र 2025-26 में कोई बजट प्राप्त नहीं हुआ है।


