शहर के बाहर ग्राम जोराताल से लेकर कुंडा-प्रतापपुर मार्ग में किसानों द्वारा गन्ने के छिलके व पराली जलाया जा रहा था। इसे लेकर भास्कर ने खबर का प्रकाशन किया है। इसके बाद अब कृषि विभाग ने किसानों से खेतों में पराली (फसल अवशेष) न जलाने की अपील की है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि फसल कटाई के बाद पराली जलाना पूर्णतः प्रतिबंधित है और यह पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। पराली जलाना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 एवं राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के तहत दंडनीय अपराध है। नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना सहित अन्य दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। किसानों से पर्यावरण संरक्षण व मृदा स्वास्थ्य संवर्धन के लिए सहयोग करने तथा सतत कृषि पद्धति अपनाने की अपील की है। जानिए, पराली जलाने से होने वाले ये है नुकसान विभाग के अनुसार अनुसार पराली जलाने से वायु प्रदूषण में वृद्धि होती है, मृदा की उर्वरता घटती है तथा खेतों में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा आग लगने की घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है। इन दुष्प्रभावों को देखते हुए किसानों से इस प्रथा को पूरी तरह त्यागने का आग्रह किया गया है। किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के वैज्ञानिक विकल्प अपनाने की सलाह दी है। इसके तहत हैप्पी सीडर एवं सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम जैसे कृषि यंत्रों का उपयोग, अवशेषों से कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट बनाना, मल्चिंग करना तथा पशु आहार के रूप में उपयोग करना शामिल है।


