शिव तत्व क्या है…
शैव दर्शन के अनुसार इस सृष्टि में 36 तत्व हैं, जिनमें से पहला पृथ्वी तत्व है और अंतिम शिव तत्व है। शिव तत्व चेतना का सबसे सूक्ष्म रूप है। वह चेतना संपूर्ण सृष्टि के मूल में है, जिससे सब कुछ जन्म लेता है और अंत में जिसमें सब कुछ लौट जाता है। वे ही मूल आधार, सृष्टि का सार हैं। यही शिव तत्व है। पार्वती तत्व क्या है…
जब आप आराधना करते हैं और चेतना की गहराई में उतरते हैं, तो आप पाते हैं कि मौन में भी गतिशीलता है। वही गतिशीलता, ज्ञान और स्पंदन “शक्ति’ या पार्वती तत्व है। शिवसूत्र में एक सूत्र है- “इच्छाशक्ति: उमा कुमारी’, जिसका अर्थ है कि शक्ति कुमारी हैं और शिव सदैव शांत अद्वैत तत्व हैं। शिव-पार्वती के विवाह का अर्थ
कथा है कि महाशिवरात्रि के दिन पार्वती और शिव का विवाह हुआ था। विवाह का अर्थ है विलीन होना, दो तत्वों का मिलकर एक हो जाना। आत्मा और उसका स्पंदन ही शिव और शक्ति हैं। इस प्रकार, शिव तत्व और पार्वती तत्व का विवाह व्यक्त और अव्यक्त तत्वों का मिलन है। यह मिलन केवल एक बार नहीं, बल्कि बार-बार होता रहता है। बुद्धि और आत्मा का, प्रकृति और पुरुष का यह विवाह निरंतर होता रहता है। शिव और शक्ति को अपने भीतर खोजने का दिन महाशिवरात्रि है। हमारी बुद्धि और आत्मा के अलग-अलग अनुभव होते हैं, लेकिन ध्यान करने से बुद्धि आत्मा में विलीन हो जाती है। इसे ही हम विवाह या प्रेम कह सकते हैं। आज यह तीन बातें महत्वपूर्ण
महाशिवरात्रि हमें ध्यान, उपवास और प्रार्थना के महत्व को समझने का अवसर प्रदान करती है। ये तीनों हमें शिव तत्व से जोड़ते हैं। इन्हें अपनाकर हम अपने जीवन में स्थिरता, शक्ति और दिव्यता ला सकते हैं। 1. ध्यान- सूर्योदय और सूर्यास्त का समय श्रेष्ठ
पूर्णिमा से पहले या अमावस्या के निकट के दिन ध्यान के लिए बहुत अनुकूल होते हैं। महाशिवरात्रि का दिन सर्दियों के अंत और वसंत के आगमन का प्रतीक है। इस दौरान ध्यान सबसे गहरा और आनंददायक माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन ध्यान करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ध्यान के लिए सूर्योदय और सूर्यास्त का समय विशेष रूप से उपयुक्त है। इस समय चेतना भी जागृत और सक्रिय होती है। 2. उपवास- शरीर विषाक्त पदार्थों से मुक्त होता है
जब परमात्मा पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो भोजन की चिंता नहीं रहती और उपवास बोझ नहीं लगता। उपवास से शरीर विषाक्त पदार्थों से मुक्त हो जाता है, और मस्तिष्क अधिक केंद्रित हो जाता है। मन को आध्यात्मिक गतिविधियों या किसी ऐसी प्रक्रिया में लगाना चाहिए जो चेतना को ऊपर उठाए, क्योंकि जब ध्यान किसी महत्वपूर्ण बात पर केंद्रित होता है, तो भोजन भूल जाना स्वाभाविक है। 3. प्रार्थना- शरीर और आत्मा पुष्ट होती है
ऊं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।
शिवरात्रि पर इस महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर सकते हैं। इसका भावार्थ है- मैं भूत, भविष्य और वर्तमान को जानने वाले तीन नेत्रों वाले शिव से जुड़ना चाहता हूं। मैं उन चैतन्य शक्ति को प्रणाम करता हूं। शिव मेरे शरीर और आत्मा को पुष्ट करने वाले हैं। वे बंधनों और माया से मुक्त करते हैं।


