चंडीगढ़ सेक्टर-56 स्थित स्मॉल फ्लैट को खाली कराने के आदेश के खिलाफ दायर अपील को जिला अदालत ने खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि अपील में कोई ठोस आधार नहीं है और कानून के मुताबिक इस पर सुनवाई नहीं की जा सकती। रमेश ने कोर्ट में दलील दी कि उन्हें और उनकी दिवंगत पत्नी शांति देवी को वर्ष 2006 की स्मॉल फ्लैट योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए यह मकान आवंटित हुआ था। वे नियमित रूप से किस्तें भरते रहे, लेकिन वर्ष 2020 में बेटे को कैंसर हो गया। इलाज के लिए गोरखपुर में करीब 9 लाख रुपए खर्च करने पड़े। बेटे की 7 नवंबर 2022 को मौत हो गई, जिससे परिवार आर्थिक रूप से टूट गया और वे किस्तें जमा नहीं कर सके। नहीं दिया सुनवाई का मौका रमेश ने कोर्ट में कहा कि उन्हें अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ। अब बकाया पैसा जमा करने के लिए तैयार हैं और उनसे मकान खाली न करवाकर दोबारा उन्हें ही दे दिया जाए। 4 नवंबर 2025 के उस नोटिस को कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनसे सेक्टर-56 के स्मॉल फ्लैट का मकान खाली करके बोर्ड को सौंपने के लिए कहा गया था। नहीं दी गई आज तक चुनौती चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड की ओर से पेश वकील ने बताया कि आवंटन पहले ही 5 मार्च 2008 को शर्तों के उल्लंघन के कारण रद्द कर दिया गया था। इसके बाद 26 जुलाई 2010 को बेदखली आदेश भी पारित हो चुका है, जिसे आज तक चुनौती नहीं दी गई। 4 नवंबर 2025 का पत्र केवल उसी बेदखली आदेश के अनुपालन में जारी किया गया था। अदालत ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि मकान का आवंटन रद्द करने और बेदखली के पुराने आदेश को कभी कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई। अपील सिर्फ 4 नवंबर 2025 के नोटिस के खिलाफ दायर की गई, जबकि असली आदेश 2008 और 2010 में ही दिए जा चुके थे। कोर्ट ने कहा कि हरियाणा हाउसिंग बोर्ड एक्ट 1971 की धारा 54 के अनुसार 30 दिन के अंदर अपील करनी होती है। कई साल बाद सिर्फ नोटिस को चुनौती देना कानूनन सही नहीं है। अदालत ने कहा कि आदेश में कोई कानूनी गलती नहीं है, इसलिए इसमें दखल देने की जरूरत नहीं है। अपील को खर्च के साथ खारिज कर दिया गया और फाइल रिकॉर्ड रूम भेजने के निर्देश दिए गए।


