कार्यशाला में तकनीकी सत्रों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। यूनिवर्सिटी ऑफ सस्केचेवान के डॉ. स्टीव शिर्टलिफ ने डिजिटल कृषि अनुसंधान और डेटा एनालिटिक्स, रिमोट सेंसिंग और निर्णय समर्थन प्रणालियों के माध्यम से फसल उत्पादन बढ़ाने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। पीएयू के डॉ. एसके संधू ने डिजिटल कृषि में विश्वविद्यालय की तैयारियों और रणनीतिक पहलों पर प्रस्तुति दी। गुरु अंगद देव वेटरिनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी के उपकुलपति डॉ. जेपीएस गिल ने पशुपालन में डिजिटल तकनीकों और डेटा आधारित निर्णय प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया। कार्यशाला में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डिजिटल नवाचार, प्रिसिजन ब्रीडिंग और तकनीकी हस्तांतरण के माध्यम से कृषि की स्थिरता और टिकाऊ विकास पर जोर दिया गया। भास्कर न्यूज़| लुधियाना। पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) डिजिटल नवाचार के माध्यम से सतत कृषि को बढ़ावा विषय पर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम जीएस खुश इंस्टीट्यूट ऑफ जेनेटिक्स, प्लांट ब्रीडिंग और बायोटेक्नोलॉजी में आयोजित किया गया, जिसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और संस्थागत नेता शामिल हुए। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य डिजिटल तकनीकों, जीनोमिक्स और नवाचार साझेदारी के माध्यम से सतत कृषि प्रणालियों को सुदृढ़ करना और किसानों और शोधकर्ताओं को नई तकनीकों से अवगत कराना था। कार्यक्रम का उद्घाटन कनाडा के यूनिवर्सिटी ऑफ सस्केचेवान के रिसर्च उपाध्यक्ष डॉ. बलजीत सिंह गिल ने किया। उन्होंने वैश्विक खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों और नवाचार तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मशीन लर्निंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, प्रिसिजन फार्मिंग और कृषि रोबोटिक्स जैसी स्मार्ट तकनीकों का उपयोग करके कृषि की स्थिरता और उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। पीएयू के उपकुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने पीएयू की कृषि में परिवर्तनकारी यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि पीएयू ने अब तक 980 से अधिक उच्च उत्पादकता वाली फसलें विकसित की हैं, जिससे किसानों की आय बढ़ी और पंजाब विश्व में गेहूं और धान की उच्चतम उत्पादकता वाले राज्यों में शामिल है। डॉ. गोसल ने डिजिटल और स्मार्ट कृषि में पीएयू के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने एआई और पूर्वानुमान मॉडल का उपयोग, आईओटी और सेंसर्स के माध्यम से प्रिसिजन फार्मिंग, उन्नत फेनोटाइपिंग प्लेटफॉर्म, 55 वर्षों के मौसम डेटा का विश्लेषण, हाइड्रोपोनिक्स और संरक्षित खेती, जीआईएस और भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग फसलों की निगरानी, मृदा विश्लेषण, ऑटोमेशन और रोबोटिक्स के माध्यम से कृषि उत्पादन बढ़ाने पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय भविष्य में किसानों को रीयल-टाइम सलाह देने के लिए चैटबोट-आधारित सूचना प्रणाली भी लॉन्च करेगा।


