परिजन की किडनी ने दी जिंदगी, अब इलाज का बोझ:दवा के लिए मदद नहीं, 281 मरीज भटक रहे

छत्तीसगढ़ में आयुष्मान योजना के तहत किडनी ट्रांसप्लांट करा चुके मरीजों के लिए ‘जीवनदान’ अब ‘जी का जंजाल’ बनता जा रहा है। विडंबना है कि सरकारी मदद से ऑपरेशन तो हो गया, लेकिन अब उस नई किडनी को बचाने के लिए जरूरी दवाइयों के पैसे गरीबों के पास नहीं हैं। प्रदेश में 2022 से अब तक 281 मरीजों का ट्रांसप्लांट हुआ है, जो अब हर महीने 20-25 हजार रुपए की दवाओं के लिए मंत्रियों और अफसरों के चक्कर काट रहे हैं। दवा न मिली तो इन मरीजों की किडनी फेल होने और दोबारा डायलिसिस पर जाने का खतरा मंडरा रहा है। दरअसल, किडनी ट्रांसप्लांट के बाद नई किडनी को सुरक्षित रखने के लिए कम से कम तीन साल तक नियमित दवाइयां लेनी पड़ती हैं, जिन पर हर महीने हजारों रुपए खर्च होते हैं। हर बार फॉलोअप और डॉक्टरी सलाह के अनुसार मरीजों की स्थिति को देखते हुए दवाएं घटाई-बढ़ाई भी जाती हैं। गरीब परिवारों के लिए यह खर्च उठा पाना नामुमकिन हो गया है। नतीजतन वे कभी संस्थाओं की मदद लेकर तो जैसे तैसे दवाओं का खर्च उठा रहे हैं। केंद्र का नियम- 3 साल मदद; छत्तीसगढ़ में किसी को लाभ नहीं
केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे आने वाले किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों को दवाइयों के लिए हर महीने 10 हजार रुपए की सहायता राशि तीन साल यानी 36 माह तक दी जानी है। इसके लिए राज्यों के स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (सोटो) के जरिए मरीजों की सूची नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट (नोटो) को भेजी जाती है। मंजूरी के बाद राशि सीधे मरीजों के खाते में आती है। हैरानी की बात यह है कि छत्तीसगढ़ में अब तक एक भी मरीज को यह सहायता नहीं मिल पाई है। साल 2023 में भी करीब 120 मरीजों की सूची गई थी, लेकिन अब तक उन्हें ही मंजूरी नहीं मिल पाई है।
ट्रांसप्लांट के बाद राजस्थान, गुजरात में दवा फ्री, बिहार में आधी राहत
राजस्थान में किडनी ट्रांसप्लांट के तहत सर्जरी की पैकेज दर 3.19 लाख रुपए है। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज की बेहतर देखभाल के लिए एक साल तक चलने वाले दवाइयां भी नि:शुल्क हैं। गुजरात में भी ट्रांसप्लांट के बाद दवाएं मरीजों को फ्री मिलती हैं। ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों का फॉलोअप में जांच के कुछ पैसे मरीजों को देने होते हैं, लेकिन उन्हें दवाइयां नि:शुल्क मिलती हैं। इसके लिए अलग-अलग बजट बनाकर रखा गया है। इसी तरह बिहार में भी इसी 50 फीसदी दवाएं निशुल्क हैं। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ संदीप सिंघल, नेफ्रोलॉजिस्ट दवा बंद तो किडनी के रिजेक्ट होने का खतरा बढ़ेगा
ट्रांसप्लांट में मरीजों की किडनी दूसरों की रहती है। वह रिजेक्ट ना हो जाए, इसके लिए मरीजों को जीवनभर किडनी की दवा खानी होती है। अगर दवा नहीं ली तो किडनी खराब होने लगेगी। कोविड के समय जब लोगों का घर से निकलना बंद हो गया था उस समय मरीजों ने दवा नहीं ली, बाद में उनकी किडनी फेल हो गई। जहां तक खर्च की बात है तो धीरे-धीरे किडनी की स्थिति के हिसाब से दवाइयां भी कम हो जाती हैं। नियमित फॉलोअप, चेकअप, टेस्ट आदि करवाना जरूरी है। भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने से बचना चाहिए, बाहर का खाना-पीना अवॉइड करना चाहिए ताकि इंफेक्शन ना हो। पढ़ाई छूटी, दवा बन रही बोझ आरंग के भैंसा सकरी गांव के प्रीत कुमार बताते हैं कि दिसंबर 2021 में तबीयत बिगड़ी। जनवरी 2022 से डायलिसिस शुरू हुआ। तब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। मां ने किडनी दी, ट्रांसप्लांट सफल रहा, पर हर महीने 20 हजार रुपए की दवा का खर्च परिवार नहीं उठा पा रहा। दवा बंद हुई तो फिर डायलिसिस होगा, ये डर सताता है। मां ने दी किडनी, दवा का अभाव रायपुर के हर्ष वर्मा बताया कि 12वीं में परेशानी हुई। जांच में पता चला कि किडनी खराब हो गई है। कुछ दिन तक डायलिसिस चला, लेकिन डॉक्टरों ने तुरंत ट्रांसप्लांट कराने कहा। यह सुन मेरी मां तत्काल किडनी देने राजी हो गईं। उनकी बदौलत आज मुझे दूसरा जीवन तो मिल गया है। लेकिन इसके बाद टेस्ट और दवाइयों का खर्च ज्यादा है।

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