55KM चलकर खाटू पहुंचे कुत्ते को मंदिर में एंट्री नहीं:विधानसभा में खोया मंत्रीजी का मोबाइल; प्रिंसिपल साहब की स्कूल में पिटाई

नमस्कार अपने मालिक के साथ 55 किलोमीटर की पदयात्रा कर खाटू पहुंचे ‘डॉग भगत’ की मंदिर में एंट्री नहीं हुई। विधानसभा में एक मंत्रीजी का मोबाइल खो गया। इस पर भी पक्ष-विपक्ष में जमकर कटाक्ष हुए। बीकानेर में प्रिंसिपल साहब से नाराज छात्र ने ‘लट्‌ठमार’ शिकायत कर दी और प्राइवेट बसों की हड़ताल के बाद रोडवेज बस के ड्राइवर का दर्द छलक पड़ा। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. श्याम मंदिर में डॉग भगत की नो एंट्री महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों को पश्चाताप हुआ। पापमुक्ति के लिए वे हिमालय होते हुए स्वर्ग की ओर चले। साथ में एक काला श्वान (कुत्ता)। एक-एक कर सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम ने बर्फ में समाधि ले ली। स्वर्ग के द्वार पर युधिष्ठिर और श्वान महाराज ही पहुंच सके। अश्वत्थामा वाले अर्धसत्य के कारण युधिष्ठिर भी एक अंगुली गंवा बैठे थे। लेकिन श्वान सही सलामत। धर्म की परीक्षा में सिर्फ कुत्ता उत्तीर्ण हुआ। इसके बाद कलयुग आ गया। उन्हीं श्वान महाराज का पुनर्जन्म जयपुर के जोबनेर में हुआ। स्वर्ग में स्थान पाने के बाद कुत्ते का वर्ण काले से व्हाइट-ब्राउन हो गया था। कुत्ते में भक्तिभाव था। मालिक धार्मिक पदयात्रा पर निकले तो कुत्ता भी पीछे-पीछे हो लिया। सड़क पर 55 किलोमीटर चलने के कारण डॉग भगत के पंजे छिल गए। छाले पड़ गए। मरहम-पट्‌टी हुई, लेकिन रुका नहीं। चलता रहा। धर्म की राह थी। चलना ही था। आखिर उस मंदिर की दहलीज पर मालिक के साथ कुत्ता भी पहुंच गया, जहां मत्था टेकने दूर-दूर से धर्मावलंबी आते थे। कोई पैदल चलकर नाचते-गाता आता था, कोई जमीन पर लोटते हुए आता था। कोई प्लेन से आता था, कोई ट्रेन से तो कोई कार से। मंदिर परिसर में भीड़। मंदिर के एंट्री-गेट पर खाकी वस्त्र पहने सुरक्षाकर्मी तैनात थे और मुस्तैद थे। उन्होंने डॉग भगत को रोक दिया। बोले-साइड से बाहर निकालो। मंदिर में एंट्री नहीं मिलेगी। मालिक खूब गिड़गिड़ाया। लोग बोले- कुत्ता भी पैदल चलकर आया है, लेकिन प्रवेश नहीं मिल सका। वहीं से डॉग महाराज और उसके मालिक को कतार से निकाल दिया गया। 2. मंत्रीजी का मोबाइल खो गया पुष्कर की कलश यात्रा में शामिल कई माताओं की सोने की चेन खो गई। कथा सुनने आई एक दादी का तो पोता ही खो गया। खोया हुआ मिला या नहीं, इसके बारे में जानकारी नहीं है। लेकिन जब विधानसभा में मंत्री महोदय का मोबाइल खो गया तो स्पीकर साहब ने गदगद हृदय से ऐलान किया- माननीय सदस्य, एक मिनट सुनिए। मुझे जानकारी हुई कि हमारे एक माननीय मंत्रीजी का मोबाइल खो गया। उन्होंने आगे कहा- जब मैंने अपनी ताकतों का उपयोग किया, उससे ध्यान आया कि हमारे गृह राज्य मंत्री जिनका कर्तव्य सारे राजस्थान और सदस्यों की रक्षा करना है, उनके पास ये मोबाइल पाया गया है। इसलिए आप (गृह राज्यमंत्री) इनको मोबाइल दे दो। उन्होंने दोबारा हंसते हुए कहा- अब इनको मोबाइल दे दो। इस बीच विपक्ष में बैठे माननीय सदस्यों ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर कटाक्ष कर दिया। इसके बाद गृह राज्यमंत्री जी खड़े हुए और कटाक्ष का जवाब कटाक्ष से दिया। बोले- आप सबकी और आपके सामान की सुरक्षा मैं करूं, ये मेरी जिम्मेदारी है। लेकिन आपके राज में तो आप यह लिख देते थे कि सवारी अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करे।
3. प्रिंसिपल से ‘लट्‌ठमार’ शिकायत शिक्षा मंत्रीजी की अपील का असर हुआ है। युवा खूब कूद-फांद मचा रहे हैं। लगता है गाय के दूध का असर है। बात बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ की है। सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल साहब अड़ गए। युवक से बोले कि जाति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करूंगा। कारण जो भी रहा, लेकिन उन्होंने साइन नहीं किया। युवक उत्साही था। उसे किसी भी कीमत पर फर्रे के कोने में प्रिंसिपल साहब के साइन चाहिए थे। पुराना नियम है, अगर सीधी अंगुली से घी न निकले, तो अंगुली टेढ़ी कर लेनी चाहिए। लेकिन युवक का मानना था कि अंगुली टेढ़ी करने का क्या तुक, जब सीधे लट्‌ठ से बात बैठ रही है। वह लट्‌ठ लेकर स्कूल के बाहर पहुंच गया। उसने दरवाजे से प्रिंसिपल साहब को ललकारा। प्रिंसिपल साहब स्कूल के बाहर निकले तो उसने उनकी टांगों को निशाना बनाकर ‘लट्‌ठमार’ शिकायत कर दी। कोई कुछ कर पाता इससे पहले उसने दूसरे नियम का पालन किया-मारकर मौके से भाग जाओ। अब शिक्षक संगठन बिलबिला रहे हैं। कह रहे हैं कि शिक्षक पर यह हमला निंदनीय है। पुलिस युवक को ढूंढकर गिरफ्तार करे। खैर, जाति प्रमाण पत्र पर तो साइन हो नहीं पाए, अब कैरेक्टर सर्टिफिकेट पर भी संकट है। 4. चलते-चलते मौकापरस्ती की हद है। दो-दो, चार-चार रुपए के चक्कर में सवारियां रोडवेज बस को ठेंगा दिखाकर प्राइवेट बस, जीप, टेम्पो में बैठ जाती हैं। उनकी भी गलती नहीं। महंगाई में आम जनता दो पैसे बचाकर चलना चाहती है। ऐसे बचतखोरों के कारण ही रोडवेज प्रबंधन घाटे में जा रहा है। लेकिन जब प्राइवेट बसों की हड़ताल हो गई, तब रोडवेज की बसों पर भीड़ टूट पड़ी। सवारियों की बहार देख ड्राइवर साहब को वह मशहूर कहावत याद आई- चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात। ड्राइवर साहब को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुई। उन्होंने सोचा- अब मजबूरी है तो जनता दरवाजों-खिड़कियों और हर संभव-असंभव सुराख से रोडवेज बसों में घुसी जा रही है। मजबूरी खत्म होगी तो फिर खाली बसें चलानी पड़ेंगी। ज्ञान के बाद गुस्से का आविर्भाव हुआ। उसने बस में चढ़ने का इंतजार कर रही सवारियों का ललकारते हुए कहा- जब गाड़ियां बंद होती हैं तो रोडवेज का सहारा ढूंढते हो। एक दिन में हजार सवारी दूसरे दिन में बीस सवारी। डीजल का पैसा भी नहीं निकलता रोडवेज का। आप डेली आओ। किराया बचाने के लालच में प्राइवेट बस की गैलरी में भी घुस जाते हो। रोडवेज बस वाला तो मजबूरी में पूरा किराया लेगा, निर्धारित किया हुआ है। आप पूरा किराया दो रोडवेज हमेशा आपका इंतजाम करके चलेगी। ड्राइवर के ऑरायुक्त भाषण से प्रभावित एक सवारी ने कहा- वाह क्या बात है श्रीमानजी। ताली बजा दो ड्राइवर साहब के लिए। भीड़ में से तालियों की आवाज आती है। इनपुट सहयोग- सुरेंद्र माथुर (सीकर), अनुराग हर्ष (बीकानेर), मुकेश सोनी (कोटा), मुकेश हिंगड़ (उदयपुर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी..

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