वाराणसी में गंगा के लहरों के बीच दिसंबर माह में ही रेत का टीला सामने घाट क्षेत्र में देखने को मिला है। जिसका कारण जानने के लिए हमने गंगा वैज्ञानिक बीडी त्रिपाठी से बातचीत की उन्होंने इसकी चार कारण हमें बताई। उन्होंने बताया कि जनवरी में कुंभ के समय स्नान के लिए पानी छोड़ा जाएगा तब यह रेत के टीले नहीं दिखाई देंगे। लेकिन वर्तमान स्थिति में जब पानी कम है तो मिट्टी और बालू जमने की प्रक्रिया बढ़ जाती है। इसीलिए बालू के टीले ऊपर आ गए हैं और पानी का प्रवाह कम हो गया है। उन्होंने बताया कि इसका सबसे बड़ा नुकसान है कि पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और इसकी वजह से जलीय जीवों को खतरा बढ़ जाता है उन्होंने कहा गंगा में अविरल नहीं रहेगी तो निर्मिता कम हो जायेगी। जाने क्यों दिख रहे गंगा में रेत के टीले बीएचयू महामना मालवीय गंगा शोध केंद्र के वैज्ञानिक प्रो. बीडी त्रिपाठी ने गंगा की इस तस्वीर के चार मुख्य कारण हैं। जिसमें सबसे पहला कारण है कि गंगा का पानी बांध बनाकर उत्तराखंड में रोका जा रहा है। दूसरा हरिद्वार से चैनल के माध्यम से दूसरे प्रदेशों में पानी का हस्ताक्षरित करना। तीसरा कारण है कि गंगा की दोनों ओर लिफ्ट कैनाल बनाकर पानी को खेतों में सप्लाई करना है। जिनसे फसलों की सिंचाई होती है। इसके साथ चौथा कारण पिछले 2 दशकों से लगातार गंगा बेसिन में भूजल स्तर का तेजी से नीचे गिरना है। इसके चार्जिंग के लिए भी गंगा का पानी नीचे जा रहा है। गंगा में पानी की कमी से ये होंगे दुष्परिणाम वैज्ञानिक प्रो. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि ‘अभी प्रश्न यह उठता है कि यदि पानी कम हो रहा है तो संकट क्या होगा। गंगा का सिमटना और रेत का अभी से दिखना भविष्य में जल संकट का बड़ा कारण है। इसका बड़ा दुष्परिणाम होगा। यदि इसके प्रभाव की बात करें तो जब भी वाटर फ्लो कम होता है तो इससे सेल्टेशन रेट बढ़ जाता है। गंगा के तलहटी में गाद और रेत की मात्रा ज्यादा से ज्यादा जमा होने लगती है। इससे गंगा की गहराई कम हो जाती है। ऐसे में डिपोजिशन रेट हाई होने से अभी से ही गंगा में बालू के टीले दिखने लगे हैं। इसके साथ ही गंगा के डाइलूजन की क्षमता कम हो रही है. जिससे पानी भी दूषित रहता है। काशी के गंगा को अर्द्ध चंद्राकार का नहीं मिल रहा फायदा उन्होंने कहा कि घाट के किनारे गंगा का पानी हमेशा रहना इसका एक बड़ा कारण था कि हमारे काशी का गंगा घाट अर्धचंद्राकार था। लेकिन अब घाट का अंध चंद्राकर स्वरूप विनष्ट हो रहा है। उन्होंने कहा कि पहले जब अस्सी नदी का प्रवाह आता था। तो जो सिल्ट जमती थी वह बीच गंगा में चली जाती थी। अब अस्सी नदी का मुहाना बदल दिया गया है। अब उसको 1 किलोमीटर दूर अपस्ट्रीम में बना दिया गया है। और अब घाट किनारे सिल्ट हमने लगा और वही कारण है कि उसकी भौगोलिक स्थिति को बदल दिया गया। और वही कारण है कि जो काशी को अर्द्ध चंद्राकार का फायदा मिलता था वह अब नहीं मिल रहा है। क्योंकि भविष्य में जब अस्सी नदी का बहाव था तो गंगा घाटों से दूर कभी नहीं गई।


