बीकानेर की मस्ती भरी होली अब परवान चढ़ने लगी है। परकोटे में बसा पुराना बीकानेर रातभर जागता है, कहीं रम्मत में आस्था उमड़ती है तो कहीं चौक के पाटों पर पुराने पर फिल्मी गीतों की बयार चलती है। होली के रसिये इन दिनों पेंट-शर्ट में नजर नहीं आते, बल्कि पारम्परिक परिधानों में सजे-धजे रहते हैं। सुबह से शाम और शाम से तड़के तक इन पर होली की मस्ती साफ देखी जा सकती है। बीती रात ठीक बारह बजे आशापुरा माता के दर्शन करने के लिए बिस्सों के चौक में हजारों की संख्या में लोग पहुंचे। यहां रम्मत शुक्रवार सुबह तक चली। हर्षो-व्यासों के पारम्परिक पानी के खेल से ठीक एक दिन पहले शुक्रवार को व्यास जाति की गैर निकलेगी। बिस्सों के चौक में देर रात मां आशापुरा के रूप में बच्चा पहुंचा तो वहां खड़े हजारों युवाओं की आस्था साफ दिखाई दी। मां के पैरों के हाथ लगाने की होड मच गई। हजारों की संख्या में खड़े लोगों ने मां के दर्शन किए और पारम्परिक गीत गाए। इसके बाद बिस्सों के चौक में पूरी रात रम्मत का दौर चला। सुबह रम्मत समाप्त हुई। बीकानेर की होली में आज बीकानेर में आज व्यास जाति की गैर निकलेगी। इस दौरान कीकाणी व्यासों के चौक, लालाणी व्यासों के चौक से व्यास जाति के लोग एक साथ पैदल निकलेंगे। पारम्परिक गीतों को गाने के साथ ही ये लोग कई मोहल्लों में होकर वापस अपने चौक में जाएंगे। हर्ष-व्यास जाति के पानी डोलची खेल से एक दिन पहले हर साल ये गैर निकलती है। कल होगा पानी का खेल बीकानेर में हर्ष और व्यास जाति के बीच पानी का खेल शनिवार को होगा। करीब पांच सौ साल पुराने इस खेल में हर्ष और व्यास जाति के युवा एक दूसरे पर पानी से वार करते हैं। चमड़े से भरी डोलची में पानी भरकर एक दूसरे पर वार किया जाएगा। करीब दो घंटे तक चलने वाले इस खेल का उद्देश्य दोनों जातियों के बीच हुए विवाद को समाप्त करना है। फागणियां फुटबॉल कल: कीचड़ में रोमांच बीकानेर की होली का सबसे अलग और रोमांचक आयोजन है फागणियां फुटबॉल। इस मैच में अलग अलग सेलिब्रेटी के स्वांग बनकर युवा फुटबॉल खेलने पहुंचते हैं। कभी कोई फिल्मी हीरोइन बनकर आता है तो कोई राजनीतिक हस्ती। इस मैच में नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रम्प के स्वांग भी नजर आएंगे। बीकानेर एकमात्र ऐसा शहर है, जहां इस तरह का फुटबॉल मैच होता है। रम्मतें: लोकनाट्य का जीवंत रंगमंच बीकानेर की रम्मतें होली की आत्मा मानी जाती हैं। पुराने शहर के मोहल्लों में देर रात तक चलने वाले इन लोकनाट्यों में इतिहास, वीरता और व्यंग्य का अद्भुत मिश्रण होता है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में ढोलक, हारमोनियम और नगाड़ों के साथ संवाद अदायगी करते हैं। चौक में बैठा जनसमुदाय तालियों और ठहाकों से कलाकारों का हौसला बढ़ाता है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। चौक-चौराहों पर फाग और रंग-रसिया शाम ढलते ही मोहल्लों में फाग गीतों की महफिल सजती है। ढोलक की थाप पर “होली खेलूं री…” जैसे पारंपरिक रसिया गूंजते हैं। बड़े-बुजुर्ग से लेकर युवा तक एक साथ बैठकर गाते हैं। अगले दिन धुलंडी पर रंग-गुलाल की बौछार के बीच गिले-शिकवे भूलाकर गले मिलने की परंपरा निभाई जाती है। बीकानेर की होली में परंपरा की गरिमा है, मस्ती की रंगत है और लोकजीवन की आत्मीयता है। यही वजह है कि मरुनगरी की होली देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं—जहां हर रंग एक कहानी कहता है और हर चौक एक उत्सव बन जाता है।


