भास्कर न्यूज | अलवर अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और इसमें खनन के मामले में स्वतः संज्ञान याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इसमें कोर्ट ने आदेश दिया कि जब तक अरावली के सीमांकन के लिए विशेषज्ञ समिति गठित नहीं हो जाती और प्रारंभिक कानूनी मुद्दों का समाधान नहीं होता, तब तक पूरे अरावली क्षेत्र में खनन से संबंधित गतिविधियों पर यथास्थिति बनी रहेगी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह आदेश दिया है। इसका असर राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात पर पड़ेगा। सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश की। कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों का एक पैनल कोर्ट को सुझाएं। इन विशेषज्ञों के नाम और प्रोफाइल भी मांगे हैं। ताकि एक निष्पक्ष और सक्षम समिति बनाई जा सके। इसके अलावा, सभी पक्षकारों को 10 मार्च तक अपने सुझाव और नोट्स दाखिल करने का समय दिया गया है। कोर्ट में न्याय मित्र ने कहा कि अरावली उत्तर भारत के लिए ग्रीन लंग्स है। अवैध और अनियंत्रित खनन के कारण कई क्षेत्रों में भूजल का स्तर 30-150 फीट से गिरकर 2000 फीट तक पहुंच गया है। यदि अरावली की शृंखलाएं नष्ट हुईं, तो थार मरुस्थल का विस्तार दिल्ली-एनसीआर की ओर तेजी से होगा, जिससे भविष्य में अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति होगी। अब सभी की निगाहें 10 मार्च के बाद होने वाली अगली सुनवाई और प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर टिकी हैं, जो अरावली के भविष्य और खनन की शर्तों को नए सिरे से परिभाषित करेंगी। विवाद की जड़ 20 नवंबर का वह फैसला है, जिसमें अरावली की परिभाषा को केवल उन पहाड़ियों तक सीमित कर दिया गया था जिनकी ऊंचाई आसपास के धरातल से कम से कम 100 मीटर हो। वही दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से कम दुरी हो तो उसे श्रृखंला माना जाएगा। इस पर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई थी कि इस परिभाषा से छोटी पहाड़ियों और पठारों को खनन माफिया के हवाले कर दिया जाएगा। एमिकस क्यूरी ने अपनी दलील में जोर दिया कि अरावली एक निरंतर भौगोलिक संरचना है। इसे राजस्थान, हरियाणा या गुजरात की राजनीतिक सीमाओं में बांटकर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने ‘ईको-सिस्टम अप्रोच’ अपनाने की सलाह दी। ताकि पहाड़ियों के बीच के क्षेत्रों और जलभृतों को एक इकाई के रूप में संरक्षित किया जा सके। रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि पूर्व में परिभाषा तय करते समय भारतीय वन सर्वेक्षण जैसे महत्वपूर्ण निकायों की पूरी सहमति नहीं ली गई थी।


