व्यापक यौन शिक्षा का सबसे जरूरी विषय है रिप्रोडक्शन यानी प्रजनन। 8वीं कक्षा में यह विषय है, क्योंकि शारीरिक बदलावों के बीच किशोर-किशोरियों में होने वाली जिज्ञासा को सही दिशा में समझाया जा सके। लेकिन, किताब का पाठ किशोरवय स्टूडेंट्स को ठीक से पढ़ाया नहीं जा रहा। शर्म, सामाजिक संकोच और पारंपरिक सोच बच्चों की जिज्ञासा को रोक रही है, उन्हें गलत ट्रैक से अधूरी या गलत जानकारी लेने पर मजबूर कर रही है। नतीजा- किशोरवय के साथ यौन अपराध या यौन समस्याएं। भास्कर ने 20 सीबीएसई और सरकारी स्कूलों के कक्षा 8वीं के विद्यार्थियों से बातचीत की। शेष | पेज 6 12 स्कूलों में यह पाठ ठीक से पढ़ाया ही नहीं गया। शिक्षकों ने इसे या तो छोड़ दिया या जल्दी-जल्दी पढ़ाकर आगे बढ़ गए। एनसीईआरटी की किताबों में छपी तस्वीरें दिखाकर खुलकर बात नहीं कर रहे। बच्चों से यहां तक कहा जा रहा है कि सही उम्र आने पर खुद समझ जाओगे…इसे घर जाकर पढ़ना। मजबूरन बच्चे इंटरनेट, दोस्तों या सोशल मीडिया से पूछ रहे हैं। यहीं से भ्रामक जानकारी, गलतफहमियां और गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को पढ़ाने में ज्यादा झिझक, नीट में भी केवल 3 प्रतिशत ही वेटेज सरकारी स्कूलों के 5 प्रधानाध्यापकों ने बताया- शिक्षक इसे विषय को पढ़ाने में असहज हैं। महिला शिक्षक चैप्टर बीच में छोड़ देती हैं। पुरुष शिक्षक पढ़ाएं तो बच्चों से अश्लील बातें करने के आरोप लगते हैं। उधर, नीट में 3% प्रश्न ही रिप्रोडक्शन से जुड़े होते हैं। ऐसे में अकादमिक स्तर पर भी इस विषय को सीमित महत्व मिल पाता है। 8वीं के बच्चों की बात सुनिए- मैम सवाल करने से रोकती हैं एक्सपर्ट व्यू- झिझक तोड़नी होगी, को-एजुकेशन स्कूलों में अलग क्लास हो 2012 में सीबीएसई ने एंसीलरी एजुकेशन शुरू की। बच्चों को शारीरिक बदलावों के बारे में बताया जाता है। लाइफ स्किल, फिजिकल एजुकेशन दिया जाता है। नई शिक्षा नीति के तहत यह पाठ पीपीटी, एनिमेटेड वीडियो, ग्राफिक के जरिए भी पढ़ा सकते हैं। सह-शिक्षा (को-एजुकेशन) स्कूलों में इसे अधिक संवेदनशीलता-सहजता से पढ़ाने के लिए छात्र-छात्राओं की अलग कक्षाएं ली जा सकती हैं, ताकि विद्यार्थी बिना झिझक प्रश्न पूछ सकें और विषय को बेहतर ढंग से समझ सकें।


