करौली में रियासतकालीन परंपरा का प्रतीक माल-मसाला मेला इस वर्ष नए उत्साह और विस्तृत स्वरूप के साथ आयोजित हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में सिमटते नजर आ रहे इस ऐतिहासिक मेले ने इस बार फिर रफ्तार पकड़ी है। मेला क्षेत्र का दायरा बढ़ाया गया है और दुकानदारों की संख्या में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। दूर-दराज से आए व्यापारियों और बड़ी संख्या में पहुंचे ग्राहकों से संकेत मिल रहे हैं कि मेला एक बार फिर विकास और विस्तार की राह पर लौट सकता है। फाल्गुन मास में लगने वाला यह मेला बीते 100 वर्षों से अधिक समय से जिला मुख्यालय के मेला मैदान में आयोजित होता आ रहा है। होली से लगभग एक सप्ताह पहले शुरू होकर होली तक चलने वाला यह मेला परंपरागत रूप से मसालों, मिर्च, लकड़ी और लोहे के घरेलू सामानों की बिक्री के लिए प्रसिद्ध है। क्षेत्रवासी यहां से सालभर के उपयोग का सामान खरीदते हैं। इस वर्ष मेले का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक विस्तृत नजर आ रहा है। भरतपुर, भुसावर, जयपुर, सवाई माधोपुर सहित अन्य जिलों और राज्यों से बड़ी संख्या में व्यापारी पहुंचे हैं। मिर्च-मसाले की दुकानों पर खास भीड़ देखने को मिल रही है। कई दुकानदारों ने बताया कि वे 15-20 वर्षों से लगातार इस मेले में व्यापार कर रहे हैं और यह मेला उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। कुछ व्यापारियों की तो दो-तीन पीढ़ियां इस मेले से जुड़ी रही हैं। ग्राहकों का कहना है कि मेले में वाजिब दरों पर ताजा और अच्छी गुणवत्ता का माल मिल जाता है, जिससे सालभर के लिए खरीदारी हो जाती है। महिलाओं के लिए सौंदर्य प्रसाधन, सजावटी सामान और घरेलू वस्तुओं की दुकानों पर भी अच्छी चहल-पहल है। वहीं बच्चों और युवाओं के मनोरंजन के लिए झूले, नाव, रहटक और ट्रंपोलिन जंप जैसे साधन आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। हालांकि, मेले की बढ़ती रौनक के बीच कुछ समस्याएं भी सामने आई हैं। दुकानदारों और ग्राहकों ने पानी की पर्याप्त व्यवस्था न होने की शिकायत की है। कुछ दुकानदारों ने महंगाई को लेकर भी चिंता जताई है।


