सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण खनिजों की ग्लोबल सप्लाई पर चीन की पकड़ खत्म करने के लिए अमेरिका ने प्रयास तेज कर दिए हैं। अमेरिकी सरकार ने अर्जेंटीना से लेकर उजबेकिस्तान तक 20 देशों से जरूरी खनिजों से जुड़े करार किए हैं। इसके अलावा चीन के सस्ते माल की डंपिंग से पश्चिमी देशों की खदानों को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका दर्जनों माइनिंग प्रोजेक्ट को सहयोग कर रहा है। अमेरिका के कई सरकारी संस्थान अहम मिनरल्स प्रोडक्शन के लिए 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक के प्रोजेक्ट की मदद कर रहे हैं। इनमें निवेश, कर्ज और सब्सिडी तक शामिल है। दुनिया के कई सबसे अहम मिनरल्स की माइनिंग और रिफाइनिंग में चीन बहुत आगे है। कंप्यूटिंग, इलेक्ट्रिफिकेशन, एयरोस्पेस और सैनिक साजो-सामान बनाने के लिए जरूरी कोई 30 से 60 धातुएं इसमें शामिल हैं। इसकेअलावा आईफोन, डेटा सेंटर, सर्जिकल लेसर और मिलिटरी टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल होने वाले भारी दुर्लभ खनिज इसी से मिलते हैं। कई अहम धातुओं पर चीन का नियंत्रण होने से उसे अपने आर्थिक और सैन्य प्रतिद्वंद्वियों पर काफी बढ़त हासिल है। पिछले साल अप्रैल में चीन ने अमेरिका को सात सबसे कीमती रेयर अर्थ मैटर की सप्लाई सीमित कर दी थी। इसकी कमी से एफ-35 जेट विमानों, मिसाइलों, ड्रोन्स, राडार और इलेक्ट्रिक मोटरों की सप्लाई रुकने का खतरा पैदा हो गया था। इसका असर इतना गहरा हुआ कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने फौरन चीन पर लागू अपने टैरिफ वापस ले लिए थे। चीन ने अब भी एंटिमनी, टंग्सटन से लेकर दर्जनों मिनरल्स की बिक्री सीमित कर रखी है। ऐसे में ट्रम्प प्रशासन ने चीन की सर्वोच्चता का मुकाबला करने का फैसला किया है। चीन प्रतिद्वंद्वियों को कुचलने के लिए बाजार में अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है। वह मूल्य कम करने के लिए कुछ खास धातुओं की अंधाधुंध सप्लाई करता है। नतीजतन मौजूदा खदानें कारोबार से बाहर हो जाती हैं या नए प्रोजेक्ट बंद हो जाते हैं। किसी समय दुनिया की सबसे बड़ी रेयर अर्थ माइन “कैलिफोर्निया माउंटेन पास” के 2002 में बंद होने में चीन के सस्ते रेयर अर्थ्स की भी भूमिका है। इस खदान का स्वामित्व अब दूसरे हाथों में है। चीनी कंपनियों ने माली से मेक्सिको तक इनमें से कई खदानें खरीद लीं। ट्रम्प सरकार ने एक्सपोर्ट इंपोर्ट बैंक (एक्जिम), ऊर्जा और प्रतिरक्षा विभाग, यूएस इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन जैसी संस्थाओं के जरिए निवेश और उत्पादन बढ़ाने का काम शुरूकिया है। इस अभियान में अमेरिकी भूभर्ग सर्वे द्वारा घोषित सभी 60 मिनरल्स शामिल हैं। इनमें एल्युमीनियम, लेड और जिंक जैसी धातुएं भी हैं। दूसरे देशों में कई प्रोजेक्ट के लिए कर्ज दिए, भारी निवेश भी – 60 बेहद महत्वपूर्ण धातुओं की माइनिंग और रिफायनिंग में चीन का दबदबा है।
– 20 देशों से समझौते किए हैं अमेरिका ने रेयर अर्थ्स की माइनिंग पर। पिछले वर्ष एक्जिम ने अहम मिनरल प्रोजेक्ट के लिए 1.36 लाख करोड़ रुपए के आशय पत्र जारी किए हैं। इनमें अमेरिका में रेयर अर्थ वेंचर के लिए 4138 करोड़ रुपए और ऑस्ट्रेलिया में कोबाल्ट, निकल के लिए 3183 करोड़ रु. शामिल हैं। ऊर्जा विभाग ने ग्रेफाइट, लिथियम और पोटाश के लिए घरेलू कंपनियों को 63 हजार करोड़ रु. से अधिक कर्ज मंजूर किए हैं। डीएफसी ने यूक्रेन और कांगो में अहम मिनरल्स के लिए 16 हजार करोड़ की फंडिंग की है। ट्रम्प प्रशासन का तीन बिंदुओं पर खास जोर ट्रम्प प्रशासन प्रोजेक्ट को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए तीन बिंदुओं पर जोर दे रहा है। पहला-कर्ज और सीधे इन्वेस्टमेंट से नई खदानों के लिए सब्सिडी। दूसरा – प्रोजेक्ट वॉल्ट के तहत माइनर्स के प्रोडक्ट की खरीद की गारंटी। तीसरा- चीन के सस्ते माल की डंपिंग से माइनर्स को बचाने के लिए मूल्य में हस्तक्षेप। डिफेंस विभाग ने भी शुरू किया दखल पिछले साल अक्टूबर के बाद से अमेरिकी रक्षा विभाग-पेंटागन ने आठ माइनिंग और रिफायनिंग प्रोजेक्ट्स को 25हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज और अंशपूंजी दी है। ये प्रोजेक्ट गैलियम और जर्मेनियम जैसी धातुओं सेसंबंधित हैं। चीन कई बार इनका निर्यात बंद कर चुका है।


