जिला स्तरीय मुख्यमंत्री रोजगार महोत्सव में शनिवार को 454 युवाओं को ज्वाइनिंग लेटर दिए गए। मंच पर एक-एक कर नाम पुकारे जा रहे थे। तालियां बज रही थीं। उसी भीड़ में 26 साल का एक युवक भी खड़ा था—सोनू मेघवाल। जब उसका नाम पुकारा गया और वह पशु परिचर के पद के लिए ज्वाइनिंग लेटर लेने मंच पर पहुंचा, तो यह सिर्फ नौकरी मिलने का पल नहीं था, बल्कि कई सालों के दर्द, संघर्ष और उम्मीद की जीत थी। निंबाहेड़ा के मांगरोल ग्राम पंचायत के वेटनरी हॉस्पिटल में उसकी नियुक्ति हुई है। आठ साल की उम्र में बदल गई जिंदगी सोनू बताते हैं कि वह केवल 8 साल के थे। स्कूल की कक्षा में दो बच्चे आपस में झगड़ रहे थे और एक-दूसरे पर स्लेट से मार रहे थे। सोनू उन्हें रोकने गए। तभी स्लेट का कोना उनकी आंखों पर जा लगा। उन्हें तुरंत हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने कह दिया कि आंखों का पर्दा पूरी तरह खराब हो चुका है। उस दिन के बाद उनकी आंखों की रोशनी चली गई। परिवार के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। कुछ समय के लिए पढ़ाई भी छूट गई। लेकिन हार मानना सोनू ने सीखा ही नहीं था धीरे-धीरे सोनू ने खुद को संभाला। उन्होंने तय किया कि वह पढ़ाई नहीं छोड़ेंगे। पड़ोस के एक शिक्षक ने जोधपुर के ब्लाइंड स्कूल के बारे में बताया। वहीं उनका दाखिला हुआ और उन्होंने 12वीं तक पढ़ाई पूरी की। नई जगह, नया तरीका, नई चुनौतियां—सब कुछ आसान नहीं था। लेकिन सोनू हर दिन खुद को समझाते थे कि जिंदगी खत्म नहीं हुई है। पिता का साया उठा, मां बनी हिम्मत सोनू की जिंदगी में दुख यहीं खत्म नहीं हुआ। साल 2009 में उनके पिता शांतिलाल मेघवाल का निधन हो गया। घर में चार भाई-बहन हैं। उनकी छोटी बहन मंजू भी बचपन से देख नहीं पाती है। पिता के जाने के बाद मां बेरी बाई पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने घर-घर जाकर झाड़ू-पोछा किया, मेहनत मजदूरी की और बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। सोनू कहते हैं, “आज मैं जहां भी हूं, अपनी मां की वजह से हूं।” पढ़ाई जारी रखी, सपना नहीं छोड़ा 12वीं के बाद सोनू चित्तौड़गढ़ लौट आए। यहां उन्होंने आरएनटी कॉलेज से BSTC की पढ़ाई की। फिर STS किया और बाद में BA में एडमिशन लिया। अभी वह BA सेकंड ईयर में हैं। पढ़ाई के साथ उन्होंने सरकारी नौकरी पाने का सपना देखा। साल 2023 में पशु परिचर की भर्ती निकली। 2024 में उन्होंने परीक्षा दी। इंतजार लंबा था, लेकिन दिसंबर 2025 में चयन की खबर आई। उनका नाम सूची में था। क्रिकेट में भी आगे थे सोनू सोनू ने सिर्फ पढ़ाई ही नहीं की, बल्कि खेल में भी आगे रहे। 12 साल की उम्र से उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया। 22 राज्य स्तरीय मैच खेले। उन्हें बड़े खिलाड़ियों से मिलने का मौका मिला। उन्होंने युवराज सिंह, महेंद्र सिंह धोनी, हरभजन सिंह से मुलाकात की। लेकिन साल 2019 में घर की जिम्मेदारियों के कारण उन्हें क्रिकेट छोड़ना पड़ा। ज्वाइनिंग लेटर देते समय मां भी रही साथ रोजगार महोत्सव में जब जिला कलेक्टर ने सोनू को ज्वाइनिंग लेटर दिया तो उन्होंने सिर्फ एक बात कही—“जो जिम्मेदारी मिली है, उसे ईमानदारी से निभाना।” उस समय सोनू की मां भी उनके साथ थीं। मां के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन वह खुशी के आंसू थे। सालों की मेहनत और संघर्ष उस एक पल में दिखाई दे रहा था।


