प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 23 सितंबर 1918 को इजराइल के हाइफा शहर को तुर्की सेना से मुक्त कराने में राजस्थान के मेजर दलपत सिंह ने अद्भुत शौर्य दिखाया। इस युद्ध में उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना लड़ाई लड़ी और वीरगति को प्राप्त हो गए। आज भी इजराइल के लोग उनके बलिदान को सलाम करते हैं। यह कहना हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का। प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को अजमेर में मेजर दलपत सिंह को लेकर कहा- मुझे इजराइल की संसद में मेजर दलपत सिंह के शौर्य को नमन करने का अवसर मिला। राजस्थान के इस वीर योद्धा ने हाइफा को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आइए जानते हैं, कौन थे ये मेजर दलपत सिंह… पाली के देवली गांव से निकला एक योद्धा
मेजर दलपत सिंह का जन्म 26 जनवरी 1892 को पाली जिले के देवली गांव में हुआ था। वे रावणा राजपूत समाज से थे। उनके पिता कर्नल हरि सिंह सेना में अधिकारी थे। हरि सिंह पोलो के शानदार खिलाड़ी भी थे। दलपत सिंह की उच्च शिक्षा इंग्लैंड के ईस्टबर्न कॉलेज में हुई। मात्र 18 वर्ष की उम्र में वे सेना में भर्ती हो गए और जोधपुर लांसर्स में तैनात हुए। हाइफा युद्ध से पहले उन्होंने 4 अगस्त 1914 को फ्रांस में जर्मनों के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया। हाइफा (इजराइल) की लड़ाई में उनके अदम्य साहस के लिए ब्रिटेन ने उन्हें मरणोपरांत मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया। खास बात यह है कि उन्होंने अपनी सेना के साथ तोपों और मशीनगनों का मुकाबला सिर्फ भालों और तलवारों से किया। इसी कारण उन्हें ‘हाइफा हीरो’ कहा जाता है। इस युद्ध में 1,000 घुड़सवारों की टीम ने महज कुछ घंटों में तुर्की सेना को धूल चटा दी, जिसमें 8 भारतीय सैनिक शहीद हुए। रीढ़ में लगी गोली, फिर भी नहीं रुकी लड़ाई
मेजर दलपत सिंह ने जोधपुर लांसर्स की टुकड़ी का नेतृत्व किया। युद्ध के दौरान मशीनगनों की गोलियां उनकी रीढ़ की हड्डी में लगीं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने लड़ना जारी रखा। विजय हासिल करने के कुछ घंटों बाद वे शहीद हो गए। इजराइल में उनके इतिहास और गौरव गाथा को स्कूलों के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। हर साल 23 सितंबर को ‘हाइफा हीरो दिवस’ मनाया जाता है। दिल्ली के त्रिमूर्ति भवन के सामने उनकी मूर्ति लगी है। जोधपुर के रेजिडेंसी रोड पर 2018 में उनकी घोड़े पर सवार मूर्ति लगाई गई। तलवारों से तोपों का मुकाबला
प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से जोधपुर रियासत ने हिस्सा लिया। मेजर दलपत सिंह की अगुवाई में हैदराबाद, मैसूर और मारवाड़ की सेनाओं ने बंदूकों और तोपों का सामना तलवारों से किया। इस युद्ध ने 400 साल पुराने ऑटोमन साम्राज्य का अंत किया और इजराइल की आजादी की नींव रखी। हाइफा शहर बंदरगाह होने के कारण ब्रिटेन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था, जिस पर तुर्की और जर्मन सेनाओं ने कब्जा कर लिया था। ब्रिटिश आदेश पर जोधपुर लांसर्स की टुकड़ी ने हाइफा को मुक्त कराने का जिम्मा संभाला। मेजर दलपत सिंह ने तलवार और भालों के दम पर दुश्मन को हराया। ———- पीएम की यह खबर भी पढ़िए…
पीएम बोले- कांग्रेस के कुकर्मों को देश माफ नहीं करेगा, ये अब INC नहीं, MMC है यानि मुस्लिम लीगी माओवादी कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा- कल ही इजराइल की यात्रा पूरी कर लौटा हूं। राजस्थान के सपूत मेजर दलपत सिंह के शौर्य को इजराइल के लोग आज भी गौरव से याद करते हैं। मुझे भी इजराइल की संसद में मेजर दलपत सिंह के शौर्य को नमन करने का मौका सौभाग्य मिला। राजस्थान के वीर बांकुरों की इजराइल के हाइफा शहर को आजाद कराने में जो भूमिका थी (पूरी खबर पढ़ें)


