चीफ जस्टिस बोले-प्रत्येक प्रकरण मानवीय कथा का प्रतिनिधित्व करता है:न्यायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में हुए शामिल, कहा- न्याय प्रशासन सत्यनिष्ठा, दक्षता और करुणा से हो

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने कहा है कि न्याय व्यवस्था से जुड़े सभी लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे ईमानदारी, कुशलता और संवेदनशीलता के साथ न्याय करें। उन्होंने कहा कि हर मामला सिर्फ एक फाइल नहीं होता, बल्कि उसके पीछे किसी व्यक्ति की ज़िंदगी और उसकी कहानी जुड़ी होती है। मुख्य न्यायाधीश रविवार को छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी, बिलासपुर द्वारा आयोजित एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह कार्यक्रम विवेकानंद सभागार में एफटीसी एवं एफटीएससी न्यायालयों के न्यायाधीशों, लोक अभियोजकों, जिला अभियोजन अधिकारियों, मानव तस्करी निरोधक प्रकोष्ठ के अधिकारियों और विवेचना अधिकारियों के लिए था। प्रशिक्षण का आयोजन मानव तस्करी निरोध, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (पॉक्सो) और ई-साक्ष्य, ई-समन एवं न्याय श्रुति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर न्यायिक संवाद के रूप में किया गया। पॉक्सो अधिनियम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह कानून बच्चों के विरुद्ध लैंगिक अपराधों की रोकथाम के लिए बाल-मित्र, सशक्त और समयबद्ध तंत्र प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसकी सफलता मानवीय और उद्देश्यपरक व्याख्या पर निर्भर करती है। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों से अपेक्षा की कि वे कठोरता और सहानुभूति के बीच संतुलन स्थापित करें। न्यायालयों में एक सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण बनाया जाए, जहाँ पीड़ित स्वयं को संरक्षित महसूस करें। साक्ष्य लेखन में संवेदनशीलता, आघात की समझ और प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपायों का कठोर अनुपालन आवश्यक बताया गया। मुख्य न्यायाधीश सिन्हा ने कहा कि अन्वेषण किसी भी आपराधिक विचारण की आधारशिला है। त्रुटिपूर्ण अन्वेषण से न्याय का हनन हो सकता है, चाहे वह दोषमुक्ति के रूप में हो या निरपराध व्यक्ति के अभियोजन के रूप में। उन्होंने विवेचना अधिकारियों से सत्य की खोज को अपनी सर्वोपरि जिम्मेदारी मानने का आह्वान किया, साथ ही साक्ष्य के सूक्ष्म संकलन, श्रृंखला संरक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण और निष्पक्ष अभिलेखन के महत्व पर बल दिया। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि एक अभियोजक का प्राथमिक कर्तव्य है कि वह प्रकरण को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करे। उसे न्यायालय को सत्य तक पहुँचने में सहयोग प्रदान करना चाहिए और पीड़ित तथा अभियुक्त दोनों के अधिकारों का समुचित संरक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। साक्ष्यों का दमन न करें..
उन्होंने यह भी कहा कि साक्ष्यों का दमन, अतिउत्साही तर्क-वितर्क अथवा अपर्याप्त तैयारी न केवल अभियोजन को कमजोर करती है, बल्कि न्याय वितरण प्रणाली में जनविश्वास को भी क्षीण करती है। ये वक्ता शामिल हुए
प्रशिक्षण में वक्ता के रूप में न्यायमूर्ति दीपक कुमार तिवारी, पूर्व न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, ध्रुव गुप्ता, पुलिस महानिरीक्षक एवं के.एल. चरयाणी, प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, अंबिकापुर उपस्थित थे। ये न्यायाधीश पहुंचे
कार्यक्रम में न्यायमूर्तिगणर्थ प्रतीम साहू साहू, नरेश कुमार चंद्रवंशी, सचिन सिंह राजपूत, राकेश मोहन पाण्डेय, राधाकिशन अग्रवाल, संजय कुमार जायसवाल, रविन्द्र कुमार अग्रवाल, अरविंद कुमार वर्मा, न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु एवं न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद, न्यायाधीशगण, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय उपस्थित रहे।

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