600 वर्ष पुराने बाबैया ढोल पर 80 वर्षीय बुजुर्ग भी थिरकेंगे

भगवान सिंह सांगाणा | भीनमालप्रदेश भर में जहां होली का पर्व 2दिन मनाया जाता है, वहीं जालोरके भीनमाल में यह 3 दिनों तकचलता है, जहां साहस, संगीत औरसामूहिकता का संगम आपकोइसकी तरफ खींच लेता है।फाल्गुन चतुर्दशी को होलिकादहन किया जाता है और पूर्णिमा कोधुलंडी खेली जाती है। लेकिनभीनमाल में पूर्णिमा के दिन घोटा गेरहोती है और उसके तीसरे दिनधुलंडी खेली जाती है। घोटा गेर केदिन हजारों लोग सजे-धजे पारंपरिकपरिधानों में, हाथों में लंबी लाठी लिएचंडीनाथ महादेव मंदिर पहुंचते हैं।बजाने से पूर्व मंदिर में इसकी पूजाअर्चना की जाती है शाम करीब 4 बजेबाबैया ढोल की गूंज के साथ गेर मंदिरसे रवाना होती है। हजारों गेरियों काहुजूम बड़े चौहटे की ओर बढ़ता है,जहां 10 से 15 मिनट तक लोग चौहटेके चारों ओर परिक्रमा करते हुए नृत्यकरते हैं। ढोल की थाप और लाठियोंकी ताल पर पूरा माहौल जोश औरऊर्जा से भर उठता है। आगे पुलिसकर्मी, पीछे लाठियों के साथ गेरिए चलते हैं मान्यता है कि यह ढोल 6 सदी पुरानापुराना है और इसे केवल होली केअवसर पर ही बजाया जाता है। बुजुर्गमुराद खां एवं मुफत खां के अनुसार,सदियों पहले इसकी आवाज 12 कोसतक सुनाई देती थी। जब यह ढोलबजता है तो भीनमाल में जन्मा 80वर्ष का बुजुर्ग भी अपने कदम थिरकनेसे नहीं रोक पाता। जब गेर मंदिर सेरवाना होती है, तो ढोल को सुरक्षा घेरेमें रखा जाता है। गांव के जिम्मेदारलोग और पुलिसकर्मी साथ-साथचलते हैं, जबकि आगे-पीछे लाठियोंसंग हजारों लोगों का हुजूम रहता है। 3 दिन तक मनती है अनोखी होली, पूर्णिमा को गेर, अगले दिन धुलंडी ढोल की थाप पर बड़े चौहटे सेनिकले जुलूस के साथ गेर शुरू हक सिंह राव ईरानी के नेतृत्व में बड़े चौहटा परशहर के गणमान्य नागरिकों की बैठक मंे होली केकार्यक्रमों को लेकर चर्चा की। बैठक के बादऐतिहासिक बबैया ढोल की थाप के साथ जुलूसनिकाला। जुलूस बड़े चौहटा से रवाना होकर खारीरोड मार्ग से होते हुए चंडीनाथ महादेव मंदिर पहुंचा,जहां विधिवत पूजा-अर्चना की। इसके बाद प्रसिद्धऐतिहासिक घोटा गैर की औपचारिक शुरुआत की। सदियों से चली आ रही परंपरा : पूर्व में बड़ेचोहटे के अलावा पीपली चौक, देतरियों काचौहटा और घांचियों के चौहटे पर भी गैर खेलीजाती थी, लेकिन गंभीर विवादों के चलते अन्यस्थानों पर सर्वसम्मति से बंद कर दिया। अभीबड़े चौहटे पर यह परंपरा पूरी शान से जारी है।सुरक्षा के लिहाज से घोटा गैर के दौरान प्रमुखमार्गों और बड़े चौहटे पर पुलिस जवानचप्पे-चप्पे पर तैनात रहते हैं। घोटा गैर सिर्फउत्सव नहीं, बल्कि साहस, संगीत औरसामूहिक उत्साह का अनूठा संगम है, जो इसेपूरे राजस्थान में विशिष्ट बनाता है। मान्यता: 15 किलोवजनी ढोल की 12कोस तक गूंज{ वजन- 15 किलो{ बकरे की खाल से हरसाल ढोल के पुड़ बनते हैं{12 कोस तक गूंज{ 600 साल पहले हुआथा निर्माण

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