अजय शर्मा की कोचिंग में जम्मू-कश्मीर कैसे बना रणजी विजेता:फाइनल से पहले टीम को शोले फिल्म की कहानी सुनाई, जिसमें मिशन के लिए हर किरदार के पास खास टास्क था

भारतीय क्रिकेट में अजय शर्मा का नाम ऐसे खिलाड़ी के रूप में दर्ज था, जिसका शानदार करियर मैच फिक्सिंग के प्रतिबंध और अदालती लड़ाइयों की भेंट चढ़ गया। बरसों तक क्रिकेट की मुख्यधारा से बाहर रहने के बाद, शर्मा ने कोच के रूप में एक ऐसी पटकथा लिखी, जो किसी बॉलीवुड ब्लॉकबस्टर से कम नहीं है। जम्मू-कश्मीर की रणजी ट्रॉफी की ऐतिहासिक खिताबी जीत 61 वर्षीय अजय शर्मा के लिए केवल एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उनके जीवन का ‘चक दे इंडिया’ मोमेंट है। फाइनल से पहले शर्मा ने टीम को फिल्म शोले का उदाहरण देते पूछा कि जय कौन बनेगा? वीरू कौन होगा? और गब्बर जैसा प्रहार कौन करेगा? उस फिल्म में एक नहीं कई हीरो थे। शर्मा कहते हैं- टीम के हर खिलाड़ी ने अपनी भूमिका चुनी और मैदान पर उसे जीकर दिखाया। अंत में वे सभी हीरो बन गए। जम्मू-कश्मीर ने एक-एक कर पूर्व चैम्पियनों को हराया। दिल्ली को उन्हीं के मैदान पर पहली बार हराया, जहां पारस डोगरा का शतक और वंशज शर्मा के 6 विकेट काम आए। हैदराबाद और मप्र के खिलाफ कम स्कोर पर सिमटने के बाद भी आबिद मुश्ताक और आकिब नबी की घातक गेंदबाजी ने मैच पलट दिए। सेमीफाइनल में बंगाल और फाइनल में कर्नाटक को हराकर पहली बार रणजी का सुल्तान बना। शर्मा का मानना है, ‘असली ताकत विश्वास थी। विरोधी टीमों के पास अनुभव था, लेकिन हमारे पास लय और भरोसा था।’ पिछले साल केरल से क्वार्टर फाइनल में मिली हार ने टीम को झकझोर दिया था। उसी से जन्मा नारा था- ‘हम इस बार ट्रॉफी जाने नहीं देंगे।’ यह संदेश ड्रेसिंग रूम से लेकर होटल कमरों तक हर जगह लिखा गया। दिल्ली के लिए छह रणजी फाइनल खेल चुके शर्मा जब जम्मू-कश्मीर के हेड कोच बने, तो उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ था। शुरुआत में खिलाड़ी उन्हें पसंद नहीं करते थे। समय के साथ धीरे-धीरे उनका रिश्ता बना। उन्होंने साफ कहा कि आईपीएल खेलने से कोई स्टार नहीं बन जाता, असली पहचान रणजी ट्रॉफी से मिलती है। अब्दुल समद इसका उदाहरण हैं, जिन्हें उन्होंने विकेट की कीमत समझाई। इस सीजन समद शीर्ष रन-स्कोररों में रहे। वहीं, आकिब नबी (60 विकेट) के रूप में उन्होंने देश को एक ऐसा गेंदबाज दिया, जिसे वे जल्द ही टीम इंडिया की जर्सी में देखते हैं। घर पर सब मुझे ‘कोच’ कहकर बुलाते हैं जम्मू-कश्मीर में केवल दो बड़े मैदान हैं। बर्फबारी के कारण साल में चार महीने मैदान पहुंच से बाहर रहते हैं। इंडोर स्टेडियम की कमी के बावजूद, शर्मा ने टीम में मोमेंटम और विश्वास पैदा किया। शर्मा के लिए यह जीत व्यक्तिगत रूप से बहुत भावुक है। जो लोग फिक्सिंग विवाद के बाद सालों तक उनसे दूर रहे, अब उनके फोन आ रहे हैं। वे कहते हैं, ‘परिवार ने हमेशा साथ दिया। अब घर पर सब मुझे कोच कहकर बुलाते हैं, यही मेरी सबसे बड़ी कमाई है।’

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