भास्कर न्यूज|गुमला/चैनपुर उरांव जनजाति समाज में प्रत्येक पर्व त्योहार को मनाने के पीछे कोई ना कोई ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है। इस समाज में फग्गु (फगुवा) परब मनाने की परंपरा अन्य जाति एवं धर्म के लोगों से अलग ही दिखाई देती है। उरांव जाति जिस प्राचीन कारण से फगुआ त्योहार मनाते हैं। इसका ऐतिहासिक महत्व अलग ही है। उरांव समाज के देवेंद्र लाल उरांव के अनुसार बहुत पुराने समय में एक ऊंचा पहाड़ (सारू पहाड़) था। जिसपर सेमल का विशाल पेड़ था। इस पेड़ पर सोनो और रूपो नाम के दो गिद्ध रहते थे। दोनों ही राक्षसी स्वभाव के थे, वे छोटे-छोटे बच्चों को अपना आहार बनाते थे। उनके कहर से परेशान लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए धर्मेश (ईश्वर) से प्रार्थना की। भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और गिद्धों को मारने के लिए लोहार से 10 मन का धनुष और 5 मन का तीर बनाने के लिए कहा। इसके बाद फागुन पूर्णिमा के दिन भगवान ने घोंसले में बैठे हुए दोनों गिद्ध को मार कर लोगों को भय मुक्त कर दिया। उसी दिन से फग्गू चंदो अर्थात फागुन पूर्णिमा के दिन होली का त्योहार मनाया जाने लगा। उन्होंने बताया कि पुराने समय में फगुवा होली के अवसर पर खुशी और उमंग में धूल उड़ाया करते थे। रंग और अबीर खेलने की परंपरा बहुत बाद में आई। सेमल वृक्ष को काटना सोनो रुपो गिद्ध का वध करना पाप का नाश करना समझ गया। क्योंकि सेमल वृक्ष और गिद्ध के मरने पर मानव समुदाय में नई खुशियली और नई उमंग आई। लोग भय मुक्त होकर जीवन यापन करने लगे। इसी कारण उरांव जाति में आज भी फागु काटने फगुआ काटने के पूर्व एक सप्ताह तक शिकार खेलने की परंपरा चली आ रही है। शिकार खेलने का अर्थ सोनो और रूपो गिद्धनी का वध करना है। जंगल से सेमल की तीन डालियां को लाकर गांव के निश्चित स्थान में गड़ा जाता है और उसे खैर घास से पूरी तरह ढंक दिया जाता है। गांव के सभी लोग के आने पर उसे जलाया जाता है। वहीं पर पुजारी द्वारा गांव की खुशहाली की कामना की जाती है। लोग उस जले हुए राख को छूते हैं ताकि उनका शारीरिक दर्द, घाव फोड़ा, फुंसी उनके शरीर में ना रहे। अगले दिन यानी की फगुवा पर्व के दिन गांव के सभी छोटे बड़े बुजुर्ग लोग शिकार के लिए जंगल जाते हैं और जंगल में जो भी जंगली जीव मिलता है। उसका शिकार करते है और आपस में बाटते हैं। जंगल में ही पूजा की सामग्री, महुआ का खोन्च, धाउ, फूल लेकर आते हैं और घर में बुजुर्ग धूप, धुवन, हड़िया, अरवा चावल, मुर्गा को चरा कर मनौती देकर पूजा करते हैं। अपने पुरखों को याद करते हैं। घर, परिवार व समाज की सुख समृद्धि कि मनोकामना करते हैं। फिर धूम धाम से रंग लगाते है और फगुवा मनाते है। जंगल में शिकार करते उरांव जाति के लोग।


