बुरा न मानो, होली है:‘कागजों की होली और कुर्सी का गुलाल’ पिचकारी में दुष्प्रचार और बाल्टी में सफाई…

बोल… जोगिरा सा-रा-रा-रा!
रंग, अबीर, गुलाल… सब हवा में तैर रहे हैं। आम लोग चेहरे पर रंग लगाते हैं और खास लोग एक-दूसरे पर आरोपों का रंग फेंकते हैं। जोगिरा… झारखंड के दो बड़े अफसरों की बातचीत अभी हवा में गुलाल बम बनकर फूटी है। इस गुलाल बम से कई चेहरे रंग गए हैं। वायरल बातचीत सुनकर लगता है, जैसे पिचकारी में पानी नहीं, बल्कि “दुष्प्रचार” भरा हो। एक साहब घबराए हुए स्वर में कहते हैं- सर, आपसे एक बात कहूं… कुछ दुश्मन लोग दुष्प्रचार कर रहे हैं। जोगिरा… साहब को दुष्प्रचार का डर ऐसा है, मानो मोहल्ले के बच्चे बिना देखे उन पर रंग फेंक रहे हों।
बोल जोगिरा सा-रा-रा-रा…। वे आगे कहते हैं… प्रताप से जुड़े कागज पकड़े गए हैं। दूसरे साहब सफाई देते हैं- “हमारे पास कोई ऐसा कागज नहीं है।” भाई, जोगिरा… होली में कागज वैसे भी जल्दी भींग जाते हैं, पर यहां कागज सूखे हैं, आरोप गीले हैं और माहौल नम है।
बात आगे बढ़ती है तो पुरानी खबर का रंग भी उभर आता है। एक साल पहले की घटना को याद करते हुए एक साहब, दूसरे साहब से शिकायत के लहजे में कहते हैं… इसका सूत्रधार आपका ही एक चेला था। जवाब आता है- “सर, मेरा चेला मत बोलिए।” जोगिरा… होली में चेले-गुरु सब एक ही रंग में रंग जाते हैं, पर यहां रंग अलग-अलग डिब्बों में बंद हैं। एक बड़ी जांच एजेंसी का यहां विशेष रंग है। बोल जोगिरा सा-रा-रा-रा…। फिर चर्चा आती है करियर खराब करने की धमकी पर। होली में लोग कपड़े खराब करते हैं, यहां करियर रंगने की तैयारी है। मानो… सब अपने-अपने चेहरे पर सफेदी पोतकर कह रहे हैं… “हम तो निर्दोष हैं, रंग किसी और ने लगाया।”
बोल जोगिरा सा-रा-रा-रा…। बातचीत आगे बढ़ती है तो गहरा नीला रंग हवा में तैरने लगता है। कहा जाता है कि यह गहरा नीला रंग फोन करके फाग गा रहा है। कह रहा है- मार्च के बाद सबको पता चल जाएगा। जोगिरा, समझे? मार्च यानी होली का महीना- जब सच से ज्यादा रंग दिखाई देता है। बोल जोगिरा सा-रा-रा-रा…।
इसी बीच बातचीत से दो और रंग निकलते हैं- एक ‘सर्वेश रंग’ और दूसरा ‘चैन रंग’। साहब पहले ‘सर्वेश रंग’ की विशेषता बताते हैं। कहते हैं कि यह रंग एक बड़े नेता की पिचकारी से निकला है। ‘चैन रंग’ को एक वर्दीधारी से जोड़कर पेश करते हैं। एक खास प्रोफेशन के लोगों की सैलरी पर भी आनंद लेते हैं। जोगिरा… यहां रंग अदृश्य है- आरोप का। डर का। कुर्सी का। पर सवाल यही है- साहब का चेहरा साफ तो रंग से डर काहे का। तय है कुछ तो ऐसा है, जो यहां समझ से परे है। समय के साथ इसका रंग भी सामने आ जाएगा। बोल जोगिरा सा-रा-रा-रा…।यहां चेहरे नहीं, चरित्र रंगे जाते हैं। कागज नहीं, कुर्सियां भींगती हैं।
और हर कोई कहता है- हम तो बस सच बता रहे हैं।नाम ऐसे उछल रहे हैं जैसे चौक-चौराहे पर रंग के गुब्बारे
हर कोई बड़े नाम की पिचकारी लेकर घूम रहा है। रंगों के इस मौसम में एक ही सलाह है- गुलाल से खेलिए, आरोपों से नहीं।

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