साल में नक्शे के सिर्फ 11 आवेदन; प्रचार न होने से फ्लॉप रही सेल्फ सर्टीफिकेशन स्कीम

आम जनता को राहत देने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने 500 गज तक के रिहायशी मकानों के नक्शे सेल्फ सर्टीफिकेशन स्कीम के तहत पास करने की योजना लागू की। मकसद साफ था कि लोगों को दफ्तरों के चक्कर से मुक्ति मिले और 15 दिन में नक्शा पास हो सके। लेकिन लागू होने के एक साल बाद भी यह योजना जमीन पर पूरी तरह फेल नजर आ रही है। नगर निगम की बिल्डिंग ब्रांच की उदासीनता के चलते योजना का लाभ जनता तक पहुंच ही नहीं पाया। न तो चारों जोन में किसी तरह का सूचना बोर्ड लगाया गया और न ही शहर में इस योजना का लाभ उठाने के लिए लोगों को प्रेरित करने संबंधी किसी प्रकार का प्रचार अभियान चलाया गया है। परिणाम यह रहा कि लोग इस स्कीम से आज भी अनजान हैं। प्रशासन आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है और लोग कई दफ्तरों में काम करवाने के लिए बाबुओं के पास चक्कर लगाने को मजबूर हैं। हकीकत- ऑनलाइन 11 नक्शों में से भी 6 ही पास भास्कर ने निगम का रिकॉर्ड खंगाला तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। जून 2024 से अब तक सेल्फ सर्टीफिकेशन स्कीम के तहत महज 11 नक्शे ही ऑनलाइन अप्लाई हुए। इनमें से भी सिर्फ 6 नक्शे पास हो पाए। इसके उलट सामान्य प्रक्रिया के तहत लोगों को नक्शे अप्लाई करने पड़ रहें हैं और नक्शा पास करवाने की लंबी प्रक्रिया के तहत पहले इंस्पेक्टर, ड्राफ्ट्समैन, एटीपी, एमटीपी और अंत में निगम कमिश्नर की मंजूरी के बाद नक्शा पास होता है। साफ है कि योजना की सही जानकारी लोगों तक नहीं पहुंची, या यूं कहें कि पहुंचाई नहीं गई जिस कारण पहले की तरह ही फाइलें दफ्तरों में घूमती दिखाई दे रही हैं। योजनाएं फेल होने के कारण शहर में अवैध इमारतों की भी भरमार का एक कारण ये भी है, लंबी प्रक्रिया से बचने के लिए कई तो बिना नक्शा पास करवाए इमारतें बना लेते हैं। योजना का उद्देश्य 15 दिन में मंजूरी देना था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। आम प्रक्रिया में नक्शा पास होने में दो महीने से ज्यादा का समय लग रहा है। इससे लोगों को आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ रही है, सो अलग। बोले सख्ती जरूरी सेल्फ सर्टीफिकेशन स्कीम बेहद अच्छी पहल है। यदि इसे सही ढंग से लागू किया जाए तो रिश्वतखोरी पर काफी हद तक रोक लग सकती है। 500 गज तक के मकानों के नक्शे आर्किटेक्ट स्तर पर ही पास हो जाएं तो जनता को बड़ी राहत मिल सकती है। उन्होंने बताया कि समस्या यह है कि आर्किटेक्ट द्वारा भेजे गए नक्शों पर अधिकारी तय 15 दिन की समय सीमा के बावजूद अंतिम दिन जवाब देते हैं। इससे पूरी प्रक्रिया 75 दिन तक खिंच जाती है। गोयल के मुताबिक सरकार को सख्ती दिखानी चाहिए। यदि अधिकारी समय पर मंजूरी न दें तो रजिस्टर्ड आर्किटेक्ट को अधिक अधिकार देकर सेल्फ सर्टीफिकेशन के आधार पर निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए। शहर में करीब 1 हजार काउंसिल रजिस्टर्ड आर्किटेक्ट हैं, जिनके जरिए यह प्रक्रिया तेज और पारदर्शी बनाई जा सकती है। विभाग ने भी नहीं की एक साल की समीक्षा स्थानीय निकाय विभाग की ओर से जारी की गई इस सुविधा को शुरू हुए लगभग एक साल से ज्यादा का समय हो चुका है लेकिन विभाग ने यह समीक्षा करने की जहमत नहीं उठाई कि एक साल बाद यह योजना कितनी कारगर सिद्ध हुई। गौर होकि लुधियाना में अवैध बिल्डिंगों का मसला जोर शोर से उठता रहा है, जिसमें नक्शा न पास होना बड़ी वजह है। लेकिन निगम अफसरों का इस ओर ध्यान न देना कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की आशंका को जन्म देता है। भास्कर एक्सपर्ट संजय गोयल, सीनियर आर्किटेक्ट

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