ऐतिहासिक और रियासतकालीन परंपराओं से जुड़ा फागुन मेला अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। बुधवार को मुख्य मेले के दिन दंतेवाड़ा में आस्था का सैलाब उमड़ने की संभावना है। बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव मां दंतेश्वरी की पालकी के साथ नगर भ्रमण पर निकलेंगे। हर साल की तरह इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु, जनजातीय समाज के प्रतिनिधि और दूर-दराज के गांवों से आए देवी-देवताओं के जत्थे शामिल होंगे। फागुन मेले के दसवें दिन प्रातःकाल रंग-भंग और पादुका पूजन की परंपरागत रस्म अदा की जाएगी। यह रस्म विशेष धार्मिक महत्व रखती है। इसके बाद देवी-देवताओं के साथ प्रतीकात्मक रूप से रंग खेला जाएगा, जो आपसी सद्भाव और सामुदायिक एकता का संदेश देता है। गुरुवार को विभिन्न गांवों से पहुंचे देवी-देवताओं के विग्रहों की भेंट पूजा कर सम्मानपूर्वक विदाई दी जाएगी। इस वर्ष मेले में एक हजार से अधिक देव विग्रह शामिल हुए हैं, जिससे पूरा नगर आध्यात्मिक वातावरण में डूबा हुआ है। मंगलवार को चंद्रग्रहण है। ग्रहण काल में मंदिर के पट बंद रखे जाते हैं। इसी कारण मंगलवार को मां दंतेश्वरी की पालकी नहीं निकली जाएगी और न ही मेले में कोई प्रमुख कार्यक्रम आयोजित होंगे। गांव-गांव से पहुंचे देवी-देवता अपने-अपने डेरे में ही विराजमान रहे। बुधवार सुबह ग्रहण समाप्ति के बाद मंदिर के पट खुलेंगे और अंतिम दिन की सभी धार्मिक रस्में विधि-विधान से संपन्न की जाएंगी। दंतेवाड़ा। सोमवार को होलिका दहन से पहले शहर में माता दंतेश्वरी की भव्य पालकी निकाली गई। मेले के नौवें दिन आंवला मार की रस्म निभाई गई। मां दंतेश्वरी की पालकी धूमधाम से नारायण मंदिर पहुंची, जहां परिक्रमा के बाद पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न हुए। मंदिर के पुजारी विजेंद्र नाथ के अनुसार, पहले पुजारी को पगड़ी पहनाने की रस्म होती है। इसके बाद दंतेश्वरी मंदिर से लाट दंड लेकर भैरव स्थल तक आमंत्रण देने जाते हैं। मंदिर द्वारा नियुक्त दो लाठुरा बोंडका लाट को कंधे पर लेकर झूमते-गाते भैरव स्थल पहुंचते हैं। वहां पूजा-अर्चना के बाद भैरव लाट द्वारा पगड़ी हरण की रस्म निभाई जाती है। पुनः लाट को जयस्तंभ चौक लाया जाता है, जहां आंवला मार की रस्म होती है। मांझी, चालकी, सेवादार और गायता जनजाति के लोग दो दलों में बंटकर एक-दूसरे पर आंवला फेंकते हैं। मान्यता है कि जिस किसी को यह आंवला लगता है, उसके पाप, दरिद्रता और रोग दूर हो जाते हैं।


