परीक्षाओं के बीच शोर पर प्रतिबंध, नतीजतन नगाड़े भी नहीं बिक रहे

होली का त्योहार सिर पर है, लेकिन इस बार महासमुंद शहर और ग्रामीण अंचलों में वह पारंपरिक रंगत गायब नजर आ रही है। कल 4 मार्च को होली का मुख्य पर्व है, इसके बावजूद नगाड़ों की वह गूंज जो पखवाड़े भर पहले से गलियों में गूंजने लगती थी, इस बार सुनाई नहीं दे रही है। होली के माहौल के फीके रहने का सबसे बड़ा कारण बोर्ड परीक्षाओं को माना जा रहा है। वर्तमान में 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं अपने मध्य चरण में हैं, वहीं कॉलेज की परीक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं। छात्रों की पढ़ाई और परीक्षाओं की गंभीरता के कारण मोहल्लों में होने वाली फाग मंडली और नगाड़ों की मस्ती इस साल नदारद है। शहर के बाजारों में नगाड़े पिछले एक सप्ताह से सजे हुए हैं, लेकिन दुकानदारों के चेहरे पर मायूसी है। व्यापारियों का कहना है कि पिछले वर्षों की तुलना में इस बार मांग आधी भी नहीं है। बाजार में ₹110 से लेकर ₹3000 प्रति जोड़ी तक के नगाड़े उपलब्ध हैं। ₹110 से ₹500 वाले छोटे नगाड़े तो कुछ बिक भी रहे हैं, लेकिन फाग गायन के लिए इस्तेमाल होने वाले बड़े नगाड़ों का कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। नहीं तो होली से पहले शाम ढलते ही युवा नगाड़ों की थाप पर फाग की मस्ती में झूमते थे, लेकिन इस बार सन्नाटा पसरा है। परीक्षा और बदलते दौर ने त्योहार का स्वरूप बदल दिया है। जिला मुख्यालय के समीपस्थ ग्राम (नयापारा) भलेसर के नगाड़ा बाजा बनाने और बेचने शिवकुमार तांडेकर ने बताया कि पखवाड़े भर में केवल गिनती के सेट ही बिके हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार का प्रमुख व्यवसाय नगाड़ा सहित अन्य बाजा बनाना और बेचना है। करीब 40 साल से वे अपने पिताजी को नगाड़ा बनाते देखते आ रहे है उनके साथ ही वे भी इसी कला को अपना लिए। हर साल सीजन में करीब 1000 जोड़ी नगाड़ा बनाते है। तीन से चार साल हो गए बाजार में पूरे नगाड़े बिक नहीं पाते। डीजे के शोरगुल के बीच पारंपरिक नगाड़ा की थाप दब गई है। इस साल तो लागत भी निकल पाना मुश्किल है। महासमुंद। बाजार में सजे नगाड़ा, ग्राहक की इंतजार में बैठा बेचने वाला। बदलती जीवनशैली की वजह से परंपरा से दूरी बढ़ी अब शहर और ग्रामीण अंचल का पढ़ा-लिखा और मध्यम वर्ग धीरे-धीरे फाग गायन और सामूहिक होली के आयोजनों से किनारा करने लगा है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों और गीतों के प्रति घटती रुचि के कारण यह गौरवशाली परंपरा अब गायब होती नजर आ रही है। हालांकि, छोटे बच्चों में अभी भी उत्साह है और वे मोहल्लों में होलिका बनाने में जुटे हैं, लेकिन बड़ों की वह पुरानी फागुनी टोली कहीं दिखाई नहीं दे रही। राजधानी के अलावा अन्य जिलों में नगाड़ों की डिमांड शिवकुमार बताते है कि उनके बनाए नगाड़ों की मांग रायपुर, गरियाबंद, बलौदाबाजार, भाटापारा, तिल्दा नेवरा जैसे शहरों में भी है। सीजन में उनका परिवार दूसरे शहरों में जाता है। उनके नगाड़ों की मांग दूर दराज तक होती है। डीजे की वजह से भी कम हो रही है नगाड़ों की मांग वर्तमान में डीजे बजाकर होली मनाने का चलन बढ़ा है। पहले होली में सुबह बच्चों के हाथों में पिचकारियां होती थी, शाम होते ही लोग अपने परिवार और दोस्तांे से मिलने के लिए रंग-गुलाल लेकर बड़ो का आर्शीर्वाद लेते है।

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