धौलपुर की पाताल तोड़ बावड़ी उपेक्षा का शिकार:1875 में बनी ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षण की दरकार

धौलपुर शहर की ऐतिहासिक पाताल तोड़ बावड़ी वर्तमान में उपेक्षा के कारण दयनीय स्थिति में है। राजस्थान की विशिष्ट धरोहरों में से एक यह बावड़ी रियासत काल में जल का प्रमुख स्रोत थी और स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। इस बावड़ी का निर्माण वर्ष 1875 के आसपास धौलपुर के महाराजा निहाल सिंह ने करवाया था। शहर के मध्य स्थित यह बावड़ी धौलपुर की सबसे लंबी और भव्य बावड़ियों में से एक है। इसे सात मंजिला बनाया गया है, जिसमें चार मंजिलें पानी के नीचे और तीन मंजिलें पानी के ऊपर हैं, जिसके कारण इसे “पाताल तोड़ बावड़ी” नाम दिया गया। गोलाकार संरचना में 16 आकर्षक द्वार
बावड़ी का घेरा लगभग 135 मीटर है और इसमें गोलाकार संरचना में 16 आकर्षक द्वार बने हैं। इसकी पत्थर की चुनाई इतनी सटीक और मजबूत है कि पत्थरों के बीच कोई दरार या खाली स्थान नहीं दिखता। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह निर्माण न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत में अद्वितीय माना जाता है। रियासत काल में इस बावड़ी के पानी का उपयोग नरसिंह बाग पैलेस में पेयजल के लिए होता था। स्वतंत्रता के बाद, वर्ष 1948 से इसका जल स्थानीय निवासियों के पेयजल स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। वर्तमान में इस बावड़ी से एकीकृत पार्क के लिए भी पानी की आपूर्ति की जाती है। ऐतिहासिक धरोहर जर्जर होती जा रही
हालांकि, समय के साथ देखरेख के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर जर्जर होती जा रही है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि प्रशासन इसका उचित संरक्षण और सौंदर्यीकरण करे, तो यह बावड़ी शहरवासियों के लिए जल का वैकल्पिक स्रोत बनने के साथ-साथ धौलपुर को पर्यटन के क्षेत्र में नई पहचान दिला सकती है। यह भव्य बावड़ी कभी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना रही होगी, लेकिन वर्तमान में यह अपने अस्तित्व और इतिहास को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। संबंधित विभागों को इसके संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

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