शेखावाटी की स्वर्ण नगरी मंडावा में इस बार होली और धुलंडी का पर्व केवल रंगों का उत्सव ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार से आए मेहमानों और भारतीय परंपराओं के मिलन का साक्षी बना। मंडावा की ऐतिहासिक हवेलियों और धोरों के बीच जब चंग की थाप गूंजी, तो विदेशी पर्यटक भी खुद को थिरकने से नहीं रोक पाए। विदेशी सैलानियों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाया और स्थानीय लोगों के साथ गले मिलकर ‘हैप्पी होली’ की बधाइयां दीं। गींदड़ और सूखी गैर का आकर्षण मंडावा में बरसों से चली आ रही गींदड़ नृत्य और सूखी गैर की परंपरा इस बार भी आकर्षण का केंद्र रही। लोक कलाकारों ने जब पारंपरिक वेशभूषा पहनकर डफ और चंग की थाप पर कदमताल शुरू की, तो माहौल पूरी तरह उत्सवमयी हो गया। कलाकारों ने दिखाए स्वांग कलाकारों के स्वांग और पारंपरिक लोक गीतों ने विदेशी मेहमानों को अचंभित कर दिया। आयोजन के दौरान बरती गई शालीनता और अनुशासन ने यह साबित कर दिया कि राजस्थानी उत्सव केवल शोर-शराबा नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक विरासत हैं। कस्बे के गणेश मंदिर, ऐतिहासिक गढ़ परिसर और डुमरा की ढाणी में विधि-विधान के साथ होलिका दहन किया गया। विदेशी पर्यटकों ने न केवल इस आयोजन को देखा, बल्कि गाइडों और स्थानीय लोगों से इसके पीछे की प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा को भी समझा। महिलाओं और श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच विदेशी सैलानियों ने भी बुराई पर अच्छाई की जीत के इस प्रतीक की पूजा-अर्चना को बेहद करीब से महसूस किया। मुक्तिधाम परिसर में थिरके विदेशी मुकुंदगढ़ मार्ग स्थित राजघराने के मुक्तिधाम परिसर में आयोजित विशेष कार्यक्रम ने उत्सव में चार चांद लगा दिए। कलाकारों ने चंग और डफ की थाप पर शानदार लोक नृत्य पेश किए। विदेशी पर्यटक का कहना है कि मंडावा की होली अद्भुत है। यहाँ के रंग, यहाँ का संगीत और यहाँ के लोगों का प्यार देखकर ऐसा लगता है जैसे हम किसी अलग ही दुनिया में आ गए हैं। भारतीय संस्कृति वाकई में महान है।


