बरसाना की लठमार होली और वृंदावन की फूलों वाली होली देश-दुनिया में मशहूर है, लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी होली के बारे में, जो पूरे साल खेली जाती है। ब्रज क्षेत्र की ये होली सिर्फ फाल्गुन के कुछ दिनों तक सीमित नहीं रहती। भास्कर टीम राजस्थान और उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर बने गांठौली गांव पहुंची। यहां हम पहुंचे गुलाल कुंड। इसके बारे में कहा जाता है कि राधा-कृष्ण ने स्वयं यहां होली खेली थी। चारों ओर गुलाल की लालिमा, ढोलक की थाप और रसिया की गूंज। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… किनारे खड़े होकर कुंड की खूबसूरती निहार रहे थे तो पास खड़े ग्रामीण बोले- ‘इसे ऊपर से देखेंगे तो श्रीनाथजी का मुख दिखाई देगा।’ ग्रामीणों का मानना है कि कुंड की संरचना भगवान श्रीकृष्ण के चेहरे जैसी प्रतीत होती है। एक ओर मोरपंख जैसा फैलाव, दूसरी तरफ गाल की आकृति। श्रद्धालु इसे साधारण जलाशय नहीं, बल्कि लीला स्थल मानते हैं। कई भक्त कुंड के जल को माथे से लगाते दिखे। उनका विश्वास है कि यह वही स्थान है जहां सखियों ने राधा और श्रीकृष्ण पर इतना गुलाल उड़ाया कि पानी तक लाल हो गया। राधारानी के कहने पर श्रीकृष्ण ने यहां खेली थी होली गुलाल कुंड के पुजारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि राधा-कृष्ण ने होली खेलने के लिए गांठौली स्थित गुलाल कुंड को चुना। यहीं युगल जोड़े ने पहली बार ग्वाल-बालों के साथ रंगों का उत्सव मनाया था। इसी वजह से गुलाल कुंड को भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की होली स्थली माना जाता है। कुंड के प्राचीन सरोवर के आसपास आज भी हर वर्ष भक्त उसी परंपरा को निभाते हैं। मंदिर के पुजारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि जब श्रीकृष्ण और राधारानी ने होली खेली थी तब सखियों ने वृक्षों की पत्तियों को पीसकर हरा रंग और टेसू के फूलों से लाल रंग बनाया था। रंग इतना अधिक बनाया और उड़ाया गया था कि आसमान से लेकर पानी तक सब रंगीन हो गया था। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी गांव से होली खेलने की परंपरा प्रारंभ की, जो कालांतर में ब्रज और पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गई।। कैसे पड़ा गांव का नाम ‘गांठौली’ मंदिर के पुजारी पंडित कृष्ण मुरारी शर्मा ने बताया कि वसंत ऋतु में राधा और श्रीकृष्ण सखियों संग होली खेल रहे थे। रंगों की मस्ती के बाद जब दोनों सिंहासन पर बैठे, तब सखियों ने मजाक में उनके वस्त्रों में गांठ बांध दी। जब युगल उठे तो टकरा गए और सखियां हंसने लगीं। बाद में उन्होंने उन पर इतना गुलाल उड़ाया कि पास का कुंड लाल हो गया। उसी घटना के कारण गांव का नाम पड़ा—गांठौली और कुंड कहलाया गुलाल कुंड। दो पेड़ श्याम तमाल और कदम मिलन के प्रतीक गुलाल कुंड के पास दो पेड़ आपस में जुड़े दिखाई देते हैं—एक श्याम तमाल और दूसरा कदम। दोनों की जड़ें अलग-अलग हैं, लेकिन तनों का हिस्सा इस तरह एक-दूसरे से सटा हुआ है। भक्त मानते हैं कि ये पेड़ श्रीकृष्ण और राधा के मिलन के प्रतीक हैं। कई श्रद्धालु इन पेड़ों के नीचे बैठकर ध्यान करते हैं, तो कई उनके तनों को स्पर्श कर आशीर्वाद मांगते हैं। इन्हीं पेड़ों के नीचे राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं स्थापित हैं। होली पर भक्त उनके चरणों में गुलाल चढ़ाते हैं। रंग लगाते हैं और भजन गाते हैं। दूर-दूर से लोग यहां आकर खेलते हैं होली होली के दिनों में गुलाल कुंड पर दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। हमारी मुलाकात जयपुर से आई गीता गुप्ता से हुई वो कहती हैं, सुना था कि यहां सालभर होली का रंग रहता है। भगवान ने यहां होली खेली थी, इसलिए हम भी उनकी भक्ति में रंगने आए हैं। ब्रज क्षेत्र में आना अपने आप में सौभाग्य है। गुजरात के राजकोट के अमर भाई अपने परिवार के साथ पहुंचे थे। वे बताते हैं, गुलाल कुंड के बारे में बहुत सुना था। यहां आकर लगता है जैसे श्रीनाथजी के बेहद करीब आ गए हों। बच्चों को अपनी संस्कृति समझाने के लिए उन्हें ऐसे स्थानों पर लाना जरूरी है। साल में यहां कभी भी आते हैं तो होली खेलकर जरूर जाते है। यह अपने आप में बहुत खास है। 5000 साल से पुराना गुलालेश्वर महादेव मंदिर भी स्थित गुलाल कुंड के एक ओर राधा-कृष्ण की होली लीला का प्रतीक स्थल है तो दूसरी ओर स्थित है प्राचीन गुलालेश्वर महादेव मंदिर। गुलालेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी ने बताया कि यहां भक्त पहले युगल सरकार के चरणों में रंग चढ़ाते हैं और फिर महादेव के दर्शन करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण बाल रूप में थे, तब भगवान शिव महात्मा का वेश धारण कर उनके दर्शन करने पहुंचे थे। माता यशोदा ने पहले उन्हें रोक दिया, लेकिन बहुत अनुरोध के बाद इसी जगह पर महादेव को बालकृष्ण के दर्शन प्राप्त हुए।


