पंडो समाज की होली:तीरंदाजी से तय होता है विजेता, मिलता है महुआ या आम का पेड़

सरगुजा संभाग के जंगलों में जब होली जलती है, तो सिर्फ लकड़ियां नहीं सुलगतीं, सदियों पुरानी परंपरा भी आगे बढ़ती है। यहां की पंडो जनजाति के लिए होली रंगों से ज्यादा तीर-धनुष का त्योहार है। होलिका दहन के दूसरे दिन गांव में उत्सव का अलग ही रंग दिखता है। ढोल-नगाड़ों की थाप, राख का तिलक और फिर 100 मीटर दूर से सटीक निशाने की चुनौती। पंडो समाज में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामुदायिक न्याय की अनोखी मिसाल भी है। जंगल में सरकारी महुआ और आम के पेड़ों को लेकर समाज के लोगों के बीच विवाद न हो, खासकर महुआ सीजन में होने वाली कहासुनी को रोकने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी। यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और अनुशासन के साथ कायम है। होली के ​दिन होलिका की जली लकड़ियों में से एक मजबूत खूंटा निकाला जाता है। इसे गांव के बीच गाड़ा जाता है। इसी खूंटे पर साधा जाता है साल का सबसे बड़ा निशाना। नियम साफ है, हर प्रतिभागी को दो मौके और जो सबसे सटीक तीर चलाएगा, वही बनेगा सालभर के लिए सरकारी महुआ या आम के पेड़ का मालिक। 100 मीटर से अधिक की दूरी से चलाना होता है तीर यहां 100 मीटर से अधिक की दूरी तय है। इतनी दूरी से तीर चलाना आसान नहीं, लेकिन पंडो समाज के युवा से लेकर बुजुर्ग तक इस परंपरा में पूरे जोश से शामिल होते हैं। जीतने वाले को मिलता है पूरा पेड़ महुआ हो या आम। पेड़ से गिरने वाला फल, महुआ, यहां तक कि उसकी डोरी तक का अधिकार उसी का होता है। अगर गांव में एक से अधिक पेड़ हैं, तो इसी तरह प्रतियोगिता के जरिए उनका भी बंटवारा होता है। न कोई विवाद, न कोई मनमुटाव, बस तीर की सटीकता से तय होता है हक। बता दें कि पंडो समाज को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1952 में सरगुजा प्रवास के दौरान “गोद पुत्र” कहा था। पंडोनगर में उनके नाम पर राष्ट्रपति भवन भी बना है। गौरवशाली इतिहास और जीवंत परंपराओं का यह संगम पंडो समाज को अलग पहचान देता है। सरगुजा संभाग के सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर, कोरिया और एमसीबी जिले में 30 हजार से अधिक पंडो जनजाति के लोग रहते हैं। पंडो को विशेष संरक्षित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है।

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