ट्रांसपोर्ट व्यापारी की इकलौती बेटी बनेगी साध्वी:विदाई लेते हुए लिखा- दासी नहीं रानी बनने जा रही हूं; जैसलमेर में होगी दीक्षा

ट्रांसपोर्ट व्यापारी की इकलौती बेटी संतोष मालू (28) 5 मार्च जैसलमेर में सांसारिक जीवन को त्याग संयम जीवन के पथ पर जैन दीक्षा ग्रहण कर साध्वी बनेंगी। सोमवार रात बाड़मेर से उनके घर से उनको परिवार और समाज के लोगों ने भावुक होकर विदाई दी। व्यापारी की बेटी ने घर से विदाई लेते समय घर की दीवार पर लिखा ‘ दासी नहीं रानी बनने जा रही हूं। इसके बाद सांसारिक सुखों की तमाम चीजों को ठुकराते हुए वह जैसलमेर के लिए रवाना हुईं। पढ़िए बीकॉम कर चुकी संतोष की दीक्षा ग्रहण करने की कहानी… कोरोना काल में मन और जीवन दोनों बदल गए संतोष बताती हैं- मेरे पिता रतनलाल मालू ट्रांसपोर्ट व्यापारी हैं। माता सुशीदेवी गृहणी है। मैं इकलौती बेटी हूं और मेरे 3 भाई हैं। बी.कॉम तक पढ़ाई कर चुकी हूं और आगे एम.कॉम करने का सपना था। लेकिन कोरोना काल में हुए आचार्य भगवन्त के बाड़मेर चातुर्मास के बाद मन और जीवन दोनों बदल गया। दीक्षा लेने की मन ही मन में ठान ली। इससे पहले दीक्षा के भाव मन में नही थे लेकिन तपस्या करना अच्छा लगता था। संतोष ने कहा- 5 मार्च को जैसलमेर में खरतर गच्छाधिपति, आचार्य भगवंत श्री जिन मणिप्रभ सूरीश्वर जी मारासा के करकमलों से प्राप्त होगी। जैसलमेर में चादर महोत्सव भी होना है इसके लिए सैकड़ो जैन साधु – संत आए हुए हैं तो उनके सभी के पावन सानिध्य में दीक्षा मिल रही है, इसके बात की बेहद खुशी है। 2 हजार किलोमीटर तक किया विहार संतोष ने कहा- 4 साल के वैराग्य काल मे गुरुकुल वास 8 माह का है। इस दौरान करीबन 2 हजार किलोमीटर का पैदल विहार सहित तप-तपस्या, साधना कर चुकी हूं। दीक्षा के लिए पापा रतनलाल मालू ने जल्द ही अनुमति दे दी। लेकिन मां सुशीला देवी ने नहीं थी। जिसके चलते उन्हें मनाने में काफी समय जरूर लगा। इसके बाद वे भी मान गई। सांसरिक जीवन में सुख क्षणिक होता है संतोष ने कहा- सांसारिक जीवन मे दिखने वाला सुख क्षणिक होता है। वास्तविक सुख केवल संयम में ही है। यह मनुष्य ओर खासकर जैन समाज मे जन्म मिलना सौभाग्य की बात है। इस जीवन मे कुछ करेगे तभी आगे के भाव सुधरेंगे। सोशल मीडिया पर सिर्फ दिखावा है बाकी कुछ नही है। दीवार पर लिखा, दासी नहीं रानी बनने जा रही हूं दासी नहीं रानी बनने जा रही हूं पर संतोष ने कहा कि लोगों की सोच है कि शादी करेंगे तो ही रानी बनेगी और इधर यानी संयम पर दासी। जबकि ऐसा नहीं है। क्योंकि प्रभु के मार्ग पर हमेशा रानियां ही होती है। कोई दासी नहीं होती है।

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