भास्कर न्यूज | बठिंडा रंगों का पावन त्योहार होली खुशियों और भाईचारे का प्रतीक है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही इस उत्सव को उम्रभर का गम बना सकती है। खासकर होली के दौरान आंखों को सबसे ज्यादा खतरा रहता है। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. मीनाक्षी सिंगला ने आम लोगों, विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को पानी से भरे गुब्बारों और रासायनिक रंगों से दूर रहने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि तेज गति से फेंका गया पानी का गुब्बारा यदि आंख पर लग जाए तो स्वच्छ पटल (कॉर्निया) फट सकता है। चोट लगने से आंख के लेंस के आगे या पीछे खून जमा हो सकता है। उन्होंने बताया कि गंभीर चोट की स्थिति में आंख का पर्दा (रेटिना) अपनी जगह से हट सकता है या आर्बिटल फ्लोर टूट सकती है, जिससे व्यक्ति की दृष्टि हमेशा के लिए जा सकती है। बाजार में मिलने वाले सस्ते और सिंथेटिक रंगों में कई हानिकारक रसायन पाए जाते हैं, जैसे: कॉपर सल्फेट (हरा रंग), लेड ऑक्साइड (काला रंग), मरकरी सल्फाइड (लाल रंग), क्रोमियम आयोडाइज (बैंगनी रंग), एल्युमिनियम ब्रोमाइड (चांदी रंग), पर्शिया ब्लू (नीला रंग)। ये हानिकारक रंग त्वचा और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। इनके कारण स्किन रैशेज, एलर्जी, जलन, आंखों में सूजन व संक्रमण, सांस की दिक्कत, अस्थमा, किडनी डैमेज और गंभीर मामलों में कैंसर का खतरा तक हो सकता है। कांटेक्ट लेंस के बजाय चश्मा पहनें, इनमें आंखें सुरक्षित डॉ. सिंगला ने कहा िक होली के दिन कॉन्टैक्ट लेंस न पहनें, इसकी जगह चश्मे का प्रयोग करें। अच्छी गुणवत्ता वाले या प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करें। चेहरे पर तेज धार वाली पिचकारी सीधे न मारें। अस्थमा या सांस की बीमारी से पीड़ित लोग गीले रंगों और रसायनों से बचें। यदि जलन, सूजन या धुंधला दिखाई दे तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें। अगर लगातार दर्द या जलन बनी रहे, आंख लाल हो जाए या पानी आना बंद न हो, देखने में धुंधलापन , ऐसी स्थिति में तुरंत किसी नेत्र रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।


