भास्कर न्यूज | बठिंडा जिले में मंगलवार को चंद्रग्रहण का प्रभाव धार्मिक आस्था के रूप में स्पष्ट रूप से देखने को मिला। ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले ही सूतक काल लगते ही मंदिरों के पट बंद कर दिए गए। सुबह करीब 6 बजे से बंद हुए मंदिरों के द्वार लगभग 13 घंटे बाद शाम 7 बजे विधि-विधान से शुद्धिकरण के पश्चात श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। पंडित राजीव मिश्रा के अनुसार, सुबह नियमित रूप से पूजा-अर्चना संपन्न हुई, लेकिन सूतक लगते ही परंपरा अनुसार मंदिर के द्वार बंद कर दिए गए। उन्होंने बताया कि शास्त्रों के अनुसार ग्रहण काल में किसी भी प्रकार की पूजा, स्पर्श या धार्मिक अनुष्ठान नहीं किए जाते, इसलिए यह व्यवस्था पूर्व निर्धारित थी। मंदिर परिसर में दिनभर शांति का माहौल रहा और आम दिनों की तुलना में आवाजाही बेहद कम रही। सुबह 6.15 बजे मंगला आरती और पूजा-अर्चना के बाद मुख्य द्वार बंद कर दिए गए थे। शाम 6.47 बजे ग्रहण समाप्त होने के बाद मंदिर की साफ-सफाई की गई तथा पवित्र गंगाजल के छिड़काव और मंत्रोच्चार के साथ विधि-विधान से शुद्धिकरण किया गया। इसके बाद मंदिर में प्रतिष्ठित देवी-देवताओं का विशेष श्रृंगार कर वस्त्र बदले गए और श्रद्धालुओं के लिए दर्शन शुरू किए गए। मंगलवार और होली पर्व के संयोग के चलते शाम को बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। देर शाम तक दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। मंदिर प्रबंधन के अनुसार, सूतक काल को लेकर लोगों ने विशेष सावधानी बरती। अधिकांश श्रद्धालुओं ने घरों में रहकर जप, पाठ और ध्यान किया। मंदिर में दर्शन बंद रहने की सूचना पूर्व में ही आमजन तक पहुंचा दी गई थी, जिससे अनावश्यक भीड़ की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई।


