मारवाड़-गोडवाड़ क्षेत्र में होली के मौके पर उन बच्चों के लिए ‘ढूंढोत्सव’ की अनोखी परंपरा मनाई जाती है, जिनकी यह पहली होली होती है। यह सदियों पुराना रीति-रिवाज है, जिसके तहत नवजात बच्चों के लिए विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है। ढूंढोत्सव का आयोजन विवाह समारोह की भांति ही पूरे विधि-विधान से होता है। सर्वप्रथम गणेश पूजन किया जाता है, जिसके बाद बच्चे को एक पाट पर बिठाया जाता है। इसके उपरांत बिंदोली निकाली जाती है, जिसमें परिवार के सदस्य और समाज के लोग गीत-संगीत के साथ शामिल होते हैं। इस मौके पर बच्चे के ननिहाल से ‘मायरा’ आता है, जिसमें कपड़े और गहने शामिल होते हैं। अन्य रिश्तेदार भी बच्चे के लिए कपड़े, मिठाई और खिलौने लेकर पहुंचते हैं, जिससे उत्सव का माहौल और भी उत्साहपूर्ण हो जाता है। होली दहन के बाद ‘गेरिए’ घर-घर जाकर बच्चों को ‘ढूंढने’ की परंपरा का निर्वहन करते हैं। जिन घरों में ढूंढ होती है, वहां स्नेहभोज का आयोजन किया जाता है। इस दौरान नाच-गाना होता है और खुशी के प्रतीक के रूप में नोट भी उड़ाए जाते हैं। यह ढूंढोत्सव केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक है। यह परंपरा राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आज भी जीवंत बनाए हुए है। इस वर्ष भी होली पर कालंद्री, मोहब्बत नगर सहित आसपास के कई गांवों में यह उत्सव धूमधाम से मनाया गया।


