भास्कर न्यूज | जशपुरनगर आधुनिकता के इस दौर में भी छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती से थामे हुए है। यहां निवास करने वाली उरांव, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, नगेशिया और कंवर जैसी विभिन्न जनजातियों के लिए होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि बुराइयों के समूल नाश और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक गहरा आध्यात्मिक अनुष्ठान है। जनजातीय परंपरा के अनुसार, होलिका दहन केवल एक रस्म नहीं बल्कि समाज की समस्त बुराइयों और बुरी शक्तियों को अग्नि के हवाले करने का कार्यक्रम है। यही कारण है कि होलिका दहन के पश्चात जिले के अधिकांश गांवों में एक अजीब सा सन्नाटा पसर जाता है। लोग होलिका दहन के स्थान के पास जाने से कतराते हैं। मान्यता है कि जब तक होलिका की राख पूरी तरह ठंडी नहीं हो जाती, तब तक उसमें समाहित बुराइयां पूरी तरह नष्ट नहीं होतीं। इन जलती हुई बुराइयों का प्रभाव किसी व्यक्ति पर न पड़े, इसलिए ग्रामीण उस स्थान से दूरी बनाए रखते हैं। विशेष बात यह है कि इस आग को ठंडा करने के लिए पानी का उपयोग वर्जित है। जब तक प्राकृतिक रूप से राख ठंडी नहीं होती, तब तक रंगों का उत्सव शुरू नहीं किया जाता। गांव के बैगा (पुजारी) द्वारा निर्धारित स्थान पर सामूहिक होलिका दहन होता है, जहाँ सभी ग्रामीण एकत्रित होकर अपनी बाधाओं को अग्नि को सौंपते हैं। भयारी पूजन के बिना अधूरा है होली का त्योहार पाकरकुदइर गांव के बैगा तेजू राम बताते हैं कि होली खेलने से पहले ”भयारी पूजन” अनिवार्य है। परिवार का वरिष्ठ सदस्य कुलदेवी, वनदेवी और ग्राम देवता की पूजा करता है, जिसमें नए फूल और फलों का अर्पण किया जाता है। जनजातीय समाज में माना जाता है कि इस पूजन के बाद ही परिवार होली खेलने और साल भर के शुभ कार्य करने के योग्य बनता है। होलिका जलाने मुहूर्त का इंतजार नहीं किया जाता जनजातीय समाज में होलिका दहन के लिए मुहूर्त का इंतजार नहीं किया जाता, बल्कि पूर्व निर्धारित तिथि की शाम को दहन संपन्न होता है। डूमरटोली, सोगड़ा, केसरा और फतेहपुर सहित अन्य गांवों में बुधवार से होली का उल्लास शुरू होगा, जो गुरुवार और शुक्रवार तक चलेगा। मौसम साफ से राख ठंडी होने में समय लगेगा, जिसके बाद ही ग्रामीण होली खेलेंगे।


