लाल-सफेद कपड़े की आंगी पहनकर गैर नृत्य:ढोल की थाप व थाली की चमक पर गैरियों ने किया डांस,185 साल पुरानी से चल रही है परंपरा

बाड़मेर जिले के सनावड़ा गांव में धुलड़ी के दिन विश्वप्रसिद्ध गेर नृत्य खेला गया। इसमें तीन-तीन पीढ़ियां एक साथ खेलती नजर आई। हर साल की भांति इस साल भी मंगलवार को वंजन आंगी पहनकर नृत्य कर हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। ढोल की थाप व थाली की चमक से एक साथ सैकड़ों गैरियों ने नृत्य किया। यह गैर नृत्य 185 साल पुराना है। दरअसल, बाड़मेर जिला मुख्यालय से 33 किलोमीटर दूर सनावड़ा गांव में हर साल गैर नृत्य किया जाता है। एशियाड में धूम मचा चुके बाड़मेर के प्रसिद्ध गैर नृत्य का आयोजन होली के दूसरे दिन मंगलवार को धुलंडी के मौके पर सनावड़ा में हुआ। सैकड़ों की संख्या में गैर कलाकारों ने लाल-सफेद आंगी पहने हुए ढोल की थाप व थाली की खनक पर मनमोहक प्रस्तुतियां दी। सदियों से चला आ रहा गेर नृत्य को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग दूर-दूर से आते है। गेर नृत्य 185 साल पुराना पश्चिमी राजस्थान का गैर नृत्य सदियों से चला आ रहा है। 185 वर्ष पुराना गैर नृत्य की धमक व क्रेज आज भी वैसा ही नजर आ रहा है। गैर नृत्य बाड़मेर या राजस्थान तक सीमित नहीं रहा है। इसकी गूंज एशियाड गेम्स तक है। साल 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाड गेम्स में जिले से गैर नृत्य करने वाले सैकड़ों लोग शामिल हुए थे। महिलाओं की रक्षा के लिए शुरू हुआ था गैर खींयाराम का कहना है कि करीब 200 वर्ष पहले किसान जब खेती-बाड़ी से फ्री हो जाते थे। महिलाएं लूर नृत्य (महिलाएं घेरा बनाकर करती है नृत्य ) करती थी। तब महिलाओं की रक्षा के लिए पुरूष हाथ में डंडा लिए हुए होते थे। कुछ लोगों ने डंडा लिए नृत्य करना शुरू किया था। धीरे-धीरे इस नृत्य से लोग जुड़ते गए। अब यह परंपरा बन गई। इसके साथ आज हमारी कला-संस्कृति बन गई है।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *