अफीम की खड़ी फसल बेकार हुई, नुकसान में डूबे किसान:बोले- बारिश में सपने बह गए; लाइसेंस कटने का सता रहा खौफ

ओलावृष्टि होने से खेत में उगे अफीम डोडे नष्ट हो गए। एवरेज अफीम नहीं दे पाए तो लाइसेंस कट जाएगा, इसलिए हमनें खुद नारकोटिक्स विभाग से फसल नष्ट करने के लिए आवेदन किया है। हमारे पास अफीम के खेत है। गम पद्धति का लाइसेंस है। ओलावृष्टि ने सब बर्बाद कर दिया। बारिश में सपने बह गए। लाखों रुपए का नुकसान हो गया। तय अफीम मिलना पॉसिबल नहीं है, इसलिए नष्ट करने की गुहार लगाई है। यह दर्द हैं उन किसानों का, जिन्होंने अफीम की खेती की। लेकिन बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि ने उनके खेतों में खड़ी लाखों रुपए की फसल को बर्बाद कर दिया। चित्तौड़गढ़ जिले सहित आसपास के इलाकों में अफीम किसानों के लिए इस बार अफीम की खेती करना शुरू से ही मुश्किलों भरा रहा है। पहले बुवाई के कुछ दिनों बाद ही तेज बारिश हो गई, जिससे कई किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ी। जैसे-तैसे फसल संभली तो डोडे लगने के कुछ दिन बाद ओलावृष्टि ने नुकसान कर दिया। कई खेतों में फसल खराब हो गई और उत्पादन पर असर पड़ रहा है। जिन किसानों की फसल ज्यादा खराब हुई है, वे अब तय औसत के अनुसार अफीम और डोडे देने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे किसान अपनी पूरी फसल नष्ट करवाने के लिए नारकोटिक्स विभाग में आवेदन कर रहे हैं। विभाग की टीम खेत पर जाकर फसल को पूरी तरह नष्ट करती है, जिससे उसका गलत उपयोग या तस्करी में इस्तेमाल न हो सके। जिले में कुल तीन डिवीजन है। इनमें पहले डिवीजन में 22, दूसरे में 10 और तीसरे में सिर्फ 4 आवेदन आए हैं। आवेदन की डेडलाइन 15 मार्च तय की गई है। हर साल की तरह इस बार भी उम्मीद है कि अधिकतर किसान अंतिम तारीख से कुछ दिन पहले आवेदन देंगे। हालांकि जिले के बेगूं और रावतभाटा तहसील क्षेत्र भीलवाड़ा जिले के विभाग के अधीन आते है। राजस्थान, एमपी और यूपी में होती है अफीम की खेती
डिवीजन प्रथम के अधिकारी बीएल मीणा ने बताया- अफीम की मुख्य खेती राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में होती है। राजस्थान में चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा, उदयपुर, कोटा, झालावाड़ और बारां जिले इस फसल के लिए प्रमुख माने जाते हैं। वहीं मध्य प्रदेश के नीमच, मंदसौर, जावरा और रतलाम (गुरूत क्षेत्र) में भी अफीम की खेती बड़े स्तर पर की जाती है। जब पौधे बड़े हो जाते हैं, तो विभाग की टीमें बनाई जाती हैं। इन टीमों में अलग-अलग राज्यों के अधिकारी भी शामिल होते हैं। ये टीमें खेतों में जाकर हर किसान की जमीन की नाप-जोख करती हैं। यदि कोई किसान तय सीमा से अधिक जमीन पर बुवाई करता है, तो एक्स्ट्रा पौधों को मौके पर ही नष्ट कर दिया जाता है। इससे अवैध उत्पादन पर रोक लगती है और पूरी प्रक्रिया नियंत्रण में रहती है। किसान बोले- खेतों में अफीम के पौधे बर्बाद हुए, सिर्फ नुकसान मिला
किसान प्रहलाद मेघवाल का कहना है- मां मोहनी बाई के नाम से पट्टा है। ओलावृष्टि होने के कारण नारकोटिक्स विभाग में खेत को नष्ट करने के लिए आवेदन किया था। खेत में खड़ी रही- सही फसल को नष्ट करवा दिया है। बुवाई से लेकर बारिश आने तक खेत की देखरेख में करीब 3 लाख का खर्चा हुआ था, इसका हमें नुकसान हुआ है। बारिश के कारण अफीम के पौधों पर आए डोडे पूरी तरह नष्ट हो चुके थे, इसीलिए समझ गए थे कि एवरेज अफीम नहीं दे पाएंगे। अगर एवरेज अफीम नहीं दी तो लाइसेंस कट जाएगा। जबकि खेत नष्ट कर देने से अगले 2 साल हमारे पास मौका रहेगा कि हमें फिर से लाइसेंस मिल सके। परिवार पूरी तरह खेती पर ही निर्भर है, ऐसे में हमनें खुद ही बची फसल नष्ट करवा दी। किसान लाल सिंह का कहना है- उनकी भी अफीम की खेती है। उनके पास गम पद्धति का लाइसेंस है। ओलावृष्टि से नष्ट होने के कारण डोडे नष्ट हो चुके थे। उनसे अफीम पूरी तरह से मिलना पॉसिबल नहीं था। इस कारण खेत नष्ट करने के लिए आवेदन किया था। लगभग एक लाख रुपए का खर्चा हुआ है, उसको हम भुगतेंगे, इसके अलावा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं है। किसान देवीलाल मेनारिया ने बताया- पांच आरी की जमीन में अफीम की खेती की थी। उनके पास CPS पद्धति का पट्टा था। बारिश के कारण फसल नष्ट हो गई। हम तय अफीम नहीं दे पाते, इसलिए गुहार लगाई कि सरकार की ओर से खेत में खड़ी फसल नष्ट कर दी जाए। अधिकारियों ने खेत नष्ट कर दिए है, अब गेहूं की खेती कर रहे हैं। नुकसान तो हुआ है, लेकिन झेलने के अलावा कोई चारा नहीं है। अफसर बोले- किसानों की संख्या बढ़ी, लेकिन दायरा कम हुआ
इस साल गम पद्धति(चीरा लगाकर अफीम निकालने की विधि) में किसानों को 10 आरी तक अनुमति दी गई है, जबकि CPS पद्धति (बिना चीरा लगाए डोडे विभाग को देते है) में पहले 10 आरी की अनुमति थी, जिसे घटाकर 5 आरी कर दिया गया है। जिला अफीम अधिकारी(डिविजन फर्स्ट) बीएल मीणा का कहना है- साल 2024-25 में डिवीजन प्रथम के 597 गांवों में 5127 गम पद्धति और 2616 CPS पद्धति के किसान थे। उस समय कुल क्षेत्रफल 774.51 हेक्टेयर था। लेकिन साल 2025-26 में गम पद्धति के किसान बढ़कर 6116 हो गए हैं, जबकि CPS पद्धति के किसान घटकर 2116 रह गए हैं। इस बार भी गांवों की संख्या 597 ही है, लेकिन कुल क्षेत्रफल घटकर 717.61 हेक्टेयर रह गया है। यानी किसानों की संख्या बढ़ी है, लेकिन जमीन का दायरा कम हुआ है। तीसरे डिवीजन में गांव और किसान बढ़े, लेकिन एरिया घट गया
जिला अफीम अधिकारी(डिवीजन तीन) आर.के. मीणा ने बताया- साल 2024-25 में 257 गांवों में 4705 गम पद्धति और 2251 CPS पद्धति के किसान थे। कुल क्षेत्रफल 695.6 हेक्टेयर था। इस साल 2025-26 में गांवों की संख्या बढ़कर 260 हो गई है। गम पद्धति के किसान बढ़कर 5665 हो गए हैं, जबकि CPS पद्धति के किसान घटकर 1658 रह गए हैं। इस बार कुल क्षेत्रफल 649.4 हेक्टेयर है। यानी यहां भी किसानों की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन खेती का कुल रकबा कम हुआ है। इससे साफ है कि विभाग क्षेत्र सीमित कर रहा है, जबकि ज्यादा किसानों को छोटे-छोटे हिस्सों में अनुमति दी जा रही है। डिवीजन दो में गांव समान, पर खेती का रकबा कम
जिला अफीम अधिकारी सेकंड (डिवीजन) डीके सिंह के अनुसार- पिछले और इस साल गांवों की संख्या 153 ही रही है। साल 2024-25 में यहां 4431 गम पद्धति और 1585 CPS पद्धति के किसानों ने 601.60 हेक्टेयर में खेती की थी। साल 2025-26 में गम पद्धति के किसान बढ़कर 5091 हो गए हैं, जबकि CPS पद्धति के किसान घटकर 1089 रह गए हैं। इस साल कुल क्षेत्रफल 563.55 हेक्टेयर है। यानी यहां भी वही स्थिति है- किसानों की संख्या बढ़ी, लेकिन कुल जमीन कम हो गई। तीनों डिवीजन में एरिया घट रहा, लेकिन किसान बढ़ रहे
तीनों डिवीजन को मिलाकर पिछले साल कुल 2071.71 हेक्टेयर में अफीम की खेती हुई थी, जिसे इस साल घटाकर 1930.51 हेक्टेयर कर दिया गया है। यानी करीब 141 हेक्टेयर क्षेत्र कम हुआ है। गांवों की संख्या पिछले साल 1007 थी, जो इस साल बढ़कर 1010 हो गई है। इसी तरह, किसानों की संख्या भी बढ़ी है। पिछले साल कुल 20716 किसान अफीम की खेती कर रहे थे, जबकि इस साल 21736 किसान जुड़े हुए हैं। चित्तौड़गढ़ जिले में इस समय 1010 गांवों के 21736 किसान मिलकर 1930.51 हेक्टेयर क्षेत्र में अफीम की फसल ले रहे हैं। अफसर बोले- फसल नष्ट करने की होगी पूरी निगरानी
मौसम की मार और उत्पादन घटने की आशंका के बीच किसान चिंतित है, लेकिन वे उम्मीद भी लगाए बैठे हैं कि आगे का मौसम ठीक रहा तो कुछ हद तक नुकसान की भरपाई हो सकेगी। नारकोटिक्स विभाग के अफसरों का कहना है- जिन किसानों की फसल पूरी तरह खराब हो गई है, वे विभाग की प्रक्रिया के तहत फसल नष्ट करवा रहे हैं। पूरी प्रक्रिया सख्ती से नियमों के अनुसार की जाती है। खेत की माप से लेकर फसल नष्ट करने तक हर कदम की निगरानी होती है।

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