कोटा रूट नशा तस्करों के लिए एक हॉटस्पॉट बना हुआ है। साल 2026 के शुरुआती 2 महीनों के आंकड़ों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। नशा तस्करी की घटनाओं में पिछले साल के मुकाबले 90% की वृद्धि दर्ज की गई है। पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए 56 दिनों में 4.5 करोड़ रुपए से अधिक की नशे की खेप पकड़ी है और तस्करी में इस्तेमाल की गई 21 कारों को भी जब्त किया है। हालांकि, पुलिस की लगातार कार्रवाई के बावजूद नशा तस्करों पर लगाम कसना मुश्किल हो रहा है। आखिर क्या वजह है कि कोटा रूट नशा तस्करों के लिए इतना पसंदीदा बन गया है? इस पूरे खेल को 4 सवालों में समझिए… 1. सवाल: कोटा के रास्ते नशे की तस्करी क्यों बढ़ रही है?
जवाब: नशे की ज्यादातर खेप झालावाड़, मंदसौर, छीपाबड़ौद और बारां के आसपास के इलाकों से आती है। कोटा ग्रामीण एसपी सुजीत शंकर के अनुसार, इन क्षेत्रों में डोडा चूरा का उत्पादन अधिक होता है। यहां कई लोग थोड़े से लालच में आकर नशे का सामान इकट्ठा कर लेते हैं और तस्करों को बेच देते हैं। इसके अलावा, पंजाब और राजस्थान के कई हिस्सों में ड्रग्स की मांग लगातार बढ़ रही है। कोटा रूट से पंजाब, जोधपुर, नागौर और पाली जैसे शहरों में तस्करी हो रही है। 2. सवाल: नशा ज्यादा किन इलाकों में सप्लाई होता है? जवाब: कोटा रूट से बेहतर रोड कनेक्टिविटी भी तस्करी बढ़ने का एक मुख्य कारण है। नाकाबंदी पार करने के बाद, तस्कर आसानी से 8 लेन व बारां-उदयपुर हाईवे पर पहुंच जाते हैं। मंदसौर की तरफ से आने वाले तस्कर: गरोठ, चेचट से मोड़क होते हुए दरा, कनवास, बपावर, देवली मांझी से सीधे कराड़िया टोल पर चढ़ते हैं। यहां से 8 लेन पकड़कर सीधे गुड़गांव साहेला पहुंच जाते हैं। चेचट से कराड़िया टोल की दूरी लगभग 90 किमी है। झालावाड़ की तरफ से आने वाले तस्कर: कोटा-झालावाड़ NH 52 से सुकेत, दरा, कनवास, बपावर, देवली मांझी होते हुए कराड़िया टोल से 8 लेन पर चढ़ते हैं। इस मार्ग से तस्कर लगभग 60-65 किमी की दूरी तय करके 8 लेन पर पहुंच जाते हैं। वैकल्पिक रूप से, वे मंडाना होते हुए बारां-उदयपुर हाईवे भी पकड़ सकते हैं। बारां-छिपाबड़ोद की तरफ से आने वाले तस्कर: अंता, कराड़िया टोल से 8 लेन पर चढ़ते हैं या बारां-उदयपुर हाईवे पकड़ लेते हैं। कोटा की सीमा में 35 किमी के बाद ही वे 8 लेन पर पहुंच जाते हैं। 3. सवाल: नशा तस्करी का क्या तरीका है?
जवाब: तस्करी में शामिल बदमाश ज्यादातर लग्जरी कारों का इस्तेमाल करते हैं। वे गाड़ियों को मॉडिफाई करवाकर उनमें गुप्त बॉक्स बनाते हैं और छोटे-छोटे पैकेट में सामान ले जाते हैं, ताकि नाकाबंदी के दौरान चेकिंग में आसानी से पकड़ में न आएं। इसके अलावा, वे गाड़ियों में फर्जी नंबर प्लेट का भी इस्तेमाल करते हैं। पुलिस से बचने के लिए, वे आते-जाते समय नंबर प्लेट बदलते रहते हैं। साथ ही, बदमाश कारों से एस्कॉर्ट भी करते हैं। एस्कॉर्ट कार पीछे चल रही तस्करी वाली गाड़ी को पुलिस की मौजूदगी की सूचना देती हुई चलती है। 4. सवाल: तस्करी पर कैसे लगाम लगाई जा सकती है?
जवाब: ग्रामीण एसपी सुजीत शंकर के अनुसार, तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए अचानक की जाने वाली नाकाबंदी (रैंडम नाकाबंदी) बेहद जरूरी है। ग्रामीण पुलिस लगातार इस तरह की नाकाबंदी कर रही है। इसी रणनीति के तहत ग्रामीण पुलिस ने बपावर, कनवास, मंडाना, मोड़क और चेचट थाना क्षेत्रों से तस्करों को पकड़ा है। पुराने मामलों की जांच से मिले नए सुरागों के आधार पर उन स्रोतों को विकसित किया जा रहा है। जहां से नशे की सप्लाई हो रही है और जहां इसकी खपत होनी है।


