ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने आरक्षित वर्ग के तहत नियुक्त आरक्षकों के जाति प्रमाण पत्रों की वैधता पर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। जस्टिस आशीष श्रोती ने संबंधित प्राधिकारी को 90 दिनों के भीतर इन प्रमाण पत्रों की जांच करने का निर्देश दिया है। एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि 11 आरक्षकों ने अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के तहत फर्जी और अपंजीकृत जाति प्रमाण पत्रों के आधार पर आरक्षक पद हासिल किया है। याचिका में आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया गया कि संबंधित एसडीओ (राजस्व) कार्यालय के अभिलेखों में इन प्रमाण पत्रों का पंजीयन नहीं मिला। कुछ मामलों में, एसडीओ ने पुलिस अधीक्षक को भेजे गए पत्रों में भी इन प्रमाण पत्रों के रजिस्टर में दर्ज न होने की जानकारी दी थी। आरक्षकों ने याचिका पर आपत्ति जताते हुए इसे तथ्य छिपाकर दायर बताया था। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि मामला सार्वजनिक पद से जुड़ा है और नियुक्ति की वैधता पर सवाल है, तो ‘क्वो-वॉरंटो’ याचिका के माध्यम से न्यायिक जांच संभव है। अदालत ने कहा कि पहले प्रमाण पत्रों की विधिवत जांच आवश्यक है। यदि जांच में प्रमाण पत्र फर्जी या अवैध पाए जाते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए। किसी भी प्रतिकूल कार्रवाई से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा। निर्धारित अवधि में जांच पूरी कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया। इन आरक्षकों के जाति प्रमाण पत्र को दी है चुनौती (1)- गीतिका बाथम, सहायक उप निरीक्षक (2)- भरतलाल, आरक्षक (3)- नीतू मांझी आरक्षक (4)- मंजू जलोरिया आरक्षक (5)- रामाशंकर, आरक्षक (6)- हेमंत बाथम, आरक्षक (7)- कंचन मांझी, आरक्षक (8)- गजराज सिंह मांझी, आरक्षक (9)- खुमान सिंह, आरक्षक (10)- दीपक केवट, आरक्षक (11)- चंद्रभान मांझी, आरक्षक (12)- धर्मेंद्र, आरक्षक


