खेलना में टीलाजी महाराज का मेला भरा:जालवृक्ष की पूजा की, डोरी बांधकर मांगी मन्नत

कोटपूतली के पावटा उपखंड स्थित खेलना की ऊंची पहाड़ी पर सिद्ध संत श्री टीलाजी महाराज का विशाल मेला आयोजित हुआ। यह मेला 600 वर्ष पुरानी तपोस्थली श्री ज्यानकी रघुनाथ मंदिर परिसर में मनाया गया। मेले में दिल्ली, कोलकाता, हरियाणा और कर्नाटक सहित कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचे। यहां एक अनूठी परंपरा के तहत भक्त टीलाजी महाराज को मंदिर परिसर में उगे जाल के वृक्ष के रूप में पूजते हैं। धुलंडी पर जडूले भी उतारे श्रद्धालु जाल और काठ गगेरन के वृक्ष को साक्षात देवता मानकर उन पर डोरी बांधकर मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर वे डोरी खोल देते हैं। वरिष्ठ कार्यकर्ता छगन लाल टीलावत ने बताया कि धूलंडी पर जात जडूले भी उतारे गए। कमेटी सदस्य गजानंद टीलावत के अनुसार, यहां हर साल होली पर दो दिवसीय भजन, सत्संग और हवन का आयोजन होता है। इस वर्ष एक माह से चल रहे श्रीरामचरित मानस के 31वें अखंड रामायण पाठ का समापन हवन-पूजन के साथ हुआ। टीलाजी महाराज ने पांच अग्नि तपस्या की थी पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में टीलाजी महाराज की संगमरमर की मूर्ति स्थापित है। इसके सामने जानकी रघुनाथजी का मंदिर है। परिसर में विश्राम स्थल, भोजनालय और सत्संग हॉल जैसी सुविधाएं भी मौजूद हैं। पहाड़ी के नीचे भी एक धार्मिक स्थल बनाया गया है। टीलाजी महाराज ने पावटा के पास ऊंचे टीलों की भूमि खेलना गांव के घने जंगलों में पांच अग्नि तपस्या सहित कठोर तप किया था। वे एक सिद्ध पुरुष थे। गलता पीठ के नामाजी द्वारा रचित पुस्तक (विक्रम संवत 1626 से 1651) में भी टीलाजी के सिद्ध पुरुष होने का उल्लेख है। पुस्तक में परमानंद को खोरी राजा लूणकरण द्वारा अपने यहां ले जाने और उनके त्रिवेणी एवं मनोहरपुर क्षेत्र में तपस्या करने का वर्णन है। टीलाजी महाराज के चार पुत्र थे, जिनमें जोगीदास, हरिदास, ध्यानदास और केशवदास शामिल थे। आज भी सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालु इन पादपों (वृक्षों) की श्रद्धा से पूजा अर्चना कर डोरी बांधकर मनौती मांगते हैं।

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