खुद टूटा, लेकिन हजारों को टूटने से बचाने निकला विश्वास:अमेठी में तीन कैफे बंद हुए तो आत्महत्या करने वाला संजय 71 हजार KM साइकिल चला चुका

जब जिंदगी की राहों में अंधेरा घिर आए और उम्मीद की कोई किरण नजर न आए, तब संजय बिश्वास की कहानी एक नई रोशनी बनकर सामने आती है। कोलकाता के रहने वाले संजय ने आत्महत्या जैसे गंभीर विषय पर जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया और अब तक करीब 71 हजार किलोमीटर की साइकिल यात्रा पूरी कर चुके हैं। उनका स्पष्ट संदेश है-आत्महत्या समस्या का हल नहीं, बल्कि अपनों के लिए आजीवन पीड़ा का कारण बनती है। साईकिल यात्रा पर उदयपुर आए पश्चिमी बंगाल के कोलकोत्ता के रहने वाले संजय बिश्वास यहां कई लोगों से मिले। यहां पर सहेलियों की बाड़ी स्थित पंडित जी की लेमन टी पर उन्होंने स्थानीय लोगों से मुलाकात कर अपनी प्रेरक कहानी सुनाई। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे खुद सकारात्मक रहें और अपने आसपास किसी भी व्यक्ति में निराशा के संकेत दिखें तो उसका साथ दें। संजय ने दैनिक भास्कर को बताया कि जीवन में मुश्किलों का दौर कोरोना महामारी के समय शुरू हुआ। वे उस समय बंगाल से उत्तर प्रदेश के अमेठी में थे और वहां उन्होंने तीन कैफे खोले और सब कुछ अच्छा चल रहा था और कोरोना महामारी के दौरान तीनों बंद हो गए। कारोबार ठप हुआ तो आर्थिक हालात बिगड़ते चले गए। ​वे बताते है कि इससे उने जीवन में निराशा इतनी गहरी हो गई कि उन्होंने दो बार आत्महत्या का प्रयास किया, लेकिन दोनों बार वे बच गए। इसके बाद उन्होंने मनोवैज्ञानिकों से काउंसलिंग ली। विशेषज्ञों की सलाह थी कि वे खुद को अकेलेपन में कैद न करें, बल्कि बाहर निकलें और जीवन को नए नजरिए से देखने की कोशिश करें। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने एक साइकिल खरीदी और शहर की सड़कों पर निकल पड़े। धीरे-धीरे साइकिल चलाना उनके लिए थेरेपी बन गया। खुली हवा, नए लोग और नए अनुभवों ने उनकी सोच बदल दी। तभी उन्होंने तय किया कि वे अपनी जिंदगी को एक मकसद देंगे-लोगों को आत्महत्या के विचार से दूर रखने का मकसद। 36 साल के संजय कहते है कि इसके बाद शुरू हुई उनकी देशव्यापी साइकिल यात्रा। वे अब तक भारत के 26 राज्यों की दो-दो बार यात्रा कर चुके हैं। इतना ही नहीं, वे नेपाल, भूटान और बांग्लादेश तक साइकिल से पहुंच चुके हैं। उनकी साइकिल पर आगे की ओर स्पष्ट लिखा रहता है’आत्महत्या न करें, जीवन अनमोल है।’ वे स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर जाकर युवाओं और आम लोगों से संवाद करते हैं और अपने अनुभव साझा करते हैं। संजय का मानना है कि यदि उनकी कहानी सुनकर एक भी व्यक्ति आत्महत्या का विचार छोड़ देता है, तो उनकी यात्रा सफल मानी जाएगी। संघर्ष से उम्मीद तक का उनका यह सफर आज हजारों लोगों के लिए हिम्मत और प्रेरणा का प्रतीक बन चुका है। वे तीन बार अभिनेता सोनू सूद से मिल चुके है। पश्चिम बंगाल के हावड़ा से ग्रेजुएशन करने वाले संजय दूसरी बार राजस्थान में आए है। उन्होंने भरतपुर से 16 नवंबर को राजस्थान में एंट्री की। इसके बाद वे भरतपुर सहित कई शहरों से होकर मार्च महीने में उदयपुर आए।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *