₹75 के तार चोरी का आरोप,2 पीढ़ियों ने लड़ा केस:सुनवाई के बीच रेल कर्मचारी और पत्नी की मौत हुई, दिव्यांग बेटे ने कराया बरी

आज से 42 साल पहले रेलवे कर्मचारी राममणि विश्वकर्मा पर आरोप लगा कि उन्होंने 75 रुपए की केबल चोरी की है। उन्हें पहले निलंबित और बाद में बर्खास्त कर दिया गया। राममणि ने रेल विभाग के आदेश के खिलाफ कोर्ट में लड़ाई लड़ी, लेकिन इस दौरान उनकी मौत हो गई। राममणि की मौत के बाद पत्नी उर्मिला ने लड़ाई का बीड़ा उठाया, पर कुछ साल बाद उनका भी निधन हो गया। इसके बाद बेटे बसंत विश्वकर्मा ने पिता के आत्मसम्मान और हक के लिए आगे आकर लड़ाई जारी रखी। सिर्फ 75 रुपए की इस लड़ाई का फैसला 42 साल बाद आया, लेकिन उसे सुनने के लिए न तो राममणि जिंदा थे और न ही उनकी पत्नी उर्मिला। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 1984 से चले आ रहे चोरी के इस केस में याचिकाकर्ता को राहत देते हुए रेलवे को निर्देश दिए कि 60 दिन के भीतर मामले का निराकरण करते हुए रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए। फिटर पर लगा था 75 रुपए का तार चोरी करने का आरोप रीवा के रहने वाले राममणि कटनी में रेलवे में फिटर के पद पर थे। 1984 में उनका वेतन करीब साढ़े चार हजार रुपए प्रतिमाह था। विभाग के अधिकारियों ने उन पर आरोप लगाया कि कार्यालय में रखा करीब 5 मीटर तार उन्होंने चोरी किया है, जिसकी कीमत 75 रुपए थी। विभागीय जांच में राममणि को दोषी पाते हुए नौकरी से निकाल दिया गया। उन्होंने अधिकारियों के सामने हाथ जोड़कर अपने आपको बेकसूर बताया, लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। सर्विस से सस्पेंड किया, गुजारा भत्ता भी नहीं दिया रेलवे की कार्रवाई को राममणि विश्वकर्मा ने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) में चुनौती दी। उनकी ओर से आर्ग्यूमेंट करते हुए अधिवक्ता प्रागल्भ लता श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि राममणि पर चोरी का आरोप सिर्फ शक के आधार पर लगाया गया था। रेलवे के पास कोई ठोस सबूत नहीं था। यह भी तर्क दिया गया कि जिसका वेतन साढ़े चार हजार रुपए है, वह नौकरी को खतरे में डालकर 75 रुपए का तार क्यों चोरी करेगा? करीब एक साल तक चले केस के बाद CAT ने राममणि की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को निलंबन में बदल दिया और निर्देश दिया कि उनके परिवार को गुजारे के लिए भत्ता दिया जाए, लेकिन रेलवे ने भत्ता नहीं दिया। इसके बाद मार्च 1986 में राममणि विश्वकर्मा ने फिर आवेदन दिया कि CAT के आदेश के बाद भी उन्हें भत्ता नहीं दिया जा रहा है। मई 1996 में CAT के आदेश पर उन्हें हर माह वेतन का 50% दिया जाने लगा। 5वां वेतन आयोग लागू होने के बाद भत्ता बढ़ाने के लिए उन्होंने फिर आवेदन दिया। 2001 में बरी हुए लेकिन पूरा वेतन नहीं मिला लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 22 अगस्त 2001 को विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट ने साक्ष्यों के अभाव में राममणि विश्वकर्मा को बरी कर दिया। इसके बाद उन्हें सेवा में बहाल किया गया और पद भी मिला, लेकिन उन्हें पूरा वेतन, इंक्रीमेंट, भत्ते और पेंशन लाभ नहीं दिए गए। रेलवे का कहना था कि उन्हें बेनिफिट ऑफ डाउट पर बरी किया गया था, इसलिए उन्हें सेवा लाभ नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर निलंबन अवधि को नॉन ड्यूटी मान लिया गया और वेतन, भत्ते रोक दिए गए। इसके बाद उन्होंने फिर CAT में आवेदन देकर कहा कि बेकसूर होने के बावजूद 1994 से 2001 तक की काटी गई 50% सैलरी नहीं दी जा रही है। 31 अगस्त को राममणि विश्वकर्मा रिटायर्ड हो गए। जब रेलवे ने पेंशन का लाभ नहीं दिया तो उन्होंने फिर CAT में आवेदन किया, लेकिन केस के दौरान ही 9 नवंबर 2004 को उनका निधन हो गया। दलील दी कि संदेह का लाभ देकर बरी किया गया बेकसूर होने के बावजूद राममणि विश्वकर्मा ने अपने सम्मान के लिए जीवन के अंतिम समय तक रेलवे से लड़ाई लड़ी। 2004 में उनके निधन के बाद उनकी पत्नी उर्मिला विश्वकर्मा ने यह लड़ाई आगे बढ़ाई। दिसंबर 2004 में उर्मिला ने रेलवे को लीगल नोटिस भेजते हुए पति की 1994 से 2001 तक की बाकी 50% सैलरी और पेंशन की मांग की। फरवरी 2005 में रेलवे ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उनके पति को संदेह का लाभ देकर बरी किया गया था। इसके बाद उर्मिला ने दिसंबर 2006 में CAT में ओरिजनल एप्लीकेशन दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। 2007 में उर्मिला विश्वकर्मा का भी निधन हो गया। ट्रिब्यूनल से नहीं मिली राहत, हाईकोर्ट में लगाई अपील 2004 में राममणि और 2007 में उर्मिला विश्वकर्मा के निधन के बाद बेटे बसंत विश्वकर्मा ने पिता के आत्मसम्मान की लड़ाई जारी रखी। CAT से राहत नहीं मिलने पर बसंत विश्वकर्मा ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की कई बार सुनवाई हुई और अलग-अलग तारीखों पर पेशी लगी। 19 फरवरी 2026 को अंतिम सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने सेवा लाभों पर पुनर्विचार के निर्देश दिए हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि मजिस्ट्रेट के निर्णय में स्पष्ट था कि अभियोजन के पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। यह केवल संदेह का लाभ नहीं, बल्कि साक्ष्य के अभाव में बरी किया जाना था। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि बिना विभागीय जांच और बिना दंड के निलंबन अवधि को स्वतः “नॉन ड्यूटी” नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केवी जंकिरामन के सिद्धांतों का हवाला देते हुए सेवा लाभों पर पुनर्विचार के निर्देश दिए। राममणि विश्वकर्मा, उनकी पत्नी उर्मिला विश्वकर्मा और बाद में बसंत विश्वकर्मा की ओर से 1984 से 2005 तक सीनियर एडवोकेट शोभा मेनन और 2005 से 2026 तक अधिवक्ता प्रागल्भ लता श्रीवास्तव ने लगातार पैरवी की। आखिरकार 42 साल बाद न्याय मिला। केस के बीच बेटे का एक्सीडेंट हुआ, दिव्यांग भी हुआ एडवोकेट प्रागल्भ लता श्रीवास्तव ने बताया कि झूठे आरोप के बावजूद राममणि और उनके परिवार को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्होंने न्यायपालिका पर विश्वास बनाए रखा और अंततः जीत हासिल की। उन्होंने यह भी बताया कि सिर्फ 75 रुपए के तार की चोरी का आरोप था, लेकिन पूरे परिवार ने आत्मसम्मान के लिए रेलवे से डटकर मुकाबला किया। केस के दौरान बसंत विश्वकर्मा का एक्सीडेंट भी हुआ। वे दिव्यांग हो गए, लेकिन उन्होंने लड़ाई जारी रखी। इस केस की एक और खास बात यह रही कि जब अधिवक्ता प्रागल्भ लता श्रीवास्तव कोर्ट में पैरवी कर रही थीं, उसी दौरान उनके पति का दिल्ली में ऑपरेशन चल रहा था, फिर भी उन्होंने इस केस को प्राथमिकता दी। ये खबर भी पढ़ें… ससुर का वचन, साले की गवाही और जज की शायरी चार साल से पति-पत्नी के बीच चल रहे विवाद में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था। मामला गहनों के झगड़े से शुरू हुआ और धीरे-धीरे अदालत तक पहुंच गया। जब किसी भी स्तर पर समझौते की राह नहीं निकल पा रही थी, तब ससुर की एक भरोसेमंद बात ने पूरे केस की दिशा बदल दी। पढ़ें पूरी खबर…

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